सनातन सत्य क्यों है

सनातन का तात्पर्य है सृष्टि के उत्पन्न होने के पूर्व उत्पन्न वह नियमों की व्यवस्था जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई है ।

अर्थात काल के उत्पन्न होने के पूर्व, कार्य कारण की व्यवस्था के भी उत्पन्न होने के पूर्व जो नियम शिव ने इस सृष्टि संचालन के लिये बनाये हैं, वह ही सनातन नियम हैं !

क्योंकि समस्त सृष्टि कार्य कारण की व्यवस्था से संचालित है ! यह कार्य कारण की व्यवस्था काल के अधीन है ! काल की व्यवस्था से ही व्यक्ति और सृष्टि संचालित है ! अतः काल को उत्पन्न करने वाली तथा नियंत्रित करने वाली जो ऊर्जा है, वही सनातन ऊर्जा है !

सभी देवी, देवता, भगवान से पहले और सृष्टि के आरंभ तथा निर्माण के पूर्व जो शक्ति इस सृष्टि का निर्माण और संचालन कर रही थी, वही सनातन ऊर्जा है !

और जो आज भी इस सृष्टि को एक व्यवस्था के तहत संचालित कर रही है, वह ही सनातन शक्ति है !

कहने का तात्पर्य यह है कि इस सृष्टि में कोई भी चीज ऐसी नहीं है, जो सनातन नियमों से संचालित न हो !

और यदि व्यक्ति आत्म कल्याण चाहता है तो उसे भी इन्हीं सनातन नियमों का अनुपालन करना होगा !

यदि व्यक्ति मात्र मानव निर्मित नियमों (विधि व्यवस्था) का आश्रय लेकर जीवन यापन करेगा, तो वह जीवन भर दुखी रहेगा और अंत में सर्वनाश के हाथों नष्ट हो जाएगा ! उसे न इस संसार में सुख मिलेगा और न ही मृत्यु के उपरांत मुक्ति मिलेगी !

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि संसार में सुख और मृत्यु के उपरांत मुक्ति प्राप्त करने के लिए मानव निर्मित व्यवस्था को त्याग कर ईश्वर द्वारा निर्मित सनातन नियम व्यवस्था का अनुपालन करना चाहिए ! क्योंकि वह व्यवस्था ही स्थाई और अक्ष्णु है ! यही ईश्वरीय व्यवस्था है !

इसीलिये सनातन को अनादि और अनन्त सत्य कहा गया है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये

www.sanatangyanpeeth.in

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2493

Newsletter Updates

Enter your email address below and subscribe to our newsletter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *