दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह कोई राजनीतिक शासक या क्रूर सरकार नहीं, बल्कि हमारा अपना ‘विकृत चित्त समाज’ है। जिसे “सामाजिक तानाशाही” नाम दिया जा सकता है।
यह एक ऐसा अदृश्य पिंजरा है, जो बिना किसी तार्किक आधार के, केवल अपनी सामूहिक विकृत विचारधारा के बल पर व्यक्ति के नितांत निजी जीवन में अवांछित दखल देता रहता है।
हमें कौन सा करियर चुनना चाहिये, जीवनसाथी किसा चुनना चाहिये, शादी कब करनी चाहिये, बच्चे पैदा करने हैं या नहीं आदि आदि बहुत से ऐसे मामले हैं जिसमें यह विकृत समाज अनावश्यक हस्तक्षेप करता रहता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह अनावश्यक दखलंदाजी व्यक्ति की बुनियादी ‘स्वायत्तता’ को कुचल देती है। जब कोई इंसान समाज की थोपी गई बेतुकी उम्मीदों और अपनी वास्तविक इच्छाओं के बीच फँसता है, तो वह भयंकर ‘संज्ञानात्मक असंगति’ और क्रोनिक तनाव का निरंतर शिकार हो जाता है।
“लोग क्या कहेंगे” का खौफ, अनुरूपता का दबाव और सामाजिक बहिष्कार का डर इंसान के ‘स्वयं’ को अंदर तक खोखला कर देता है। यही मानसिक घुटन कई बार अवसाद और आत्महत्या जैसे दुखद कदमों का सबसे बड़ा कारण बनती है।
इस सामाजिक तानाशाही से मुक्ति के लिये व्यक्ति को शैव ग्राम आकर अपने जीवन को परिपक्व बनाने के लिये विशेष प्रशिक्षण लेना चाहिये !
एक स्वस्थ और प्रगतिशील चित्त का व्यक्ति ही समाज में उन्मुक्त और विकासशील जीवन जी सकता है, जो स्वयं और लोगों की व्यक्तिगत संप्रभुता और व्यक्तिवाद का सम्मान करे।
हमें सामूहिक विकृत भेड़चाल का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र विचारक बनना चाहिए। सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर, तर्क और अपनी वास्तविक खुशी के आधार पर जीवन के निर्णय लेना ही ‘स्वतंत्रता’ का असली अर्थ है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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