वर्तमान विद्यालयों की नींव 18 वीं और 19 वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के दौरान रखी गई थी। उस समय समाज को विचारशील मनुष्यों की नहीं, बल्कि कारखानों में काम करने वाले आज्ञाकारी मजदूरों की आवश्यकता थी।
एक जैसी वेशभूषा पहनना, समय सूचक घंटी बजने पर एक कार्य से दूसरे कार्य पर जाना, चुपचाप एक पंक्ति में बैठना और बिना कोई प्रश्न किए केवल आदेशों का पालन करना, यह सब कारखानों के अनुशासन का ही एक रूप था। शिक्षा का यह ढांचा इसलिए बनाया गया था ताकि मनुष्य को एक ऐसे यंत्र में बदला जा सके जो बिना थके एक ही कार्य को बार-बार कर सके।
आज 21 वीं सदी में हम उसी 200 वर्ष पुरानी व्यवस्था को ढो रहे हैं। आज हमारे पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उच्च कोटि के संगणक हैं। ये उन्नत प्रणालियां किसी भी मनुष्य की तुलना में करोड़ों गुना अधिक सूचनाएं अपने भीतर सहेज सकती हैं और पलक झपकते ही जटिल से जटिल गणनाएं कर सकती हैं।
ऐसे युग में युवाओं को ऐतिहासिक तिथियां, गणितीय सूत्र और पुस्तकीय तथ्य रटाना उनके अमूल्य मस्तिष्क को एक दोयम दर्जे का यंत्र बनाने का असफल प्रयास है। जब सारा ज्ञान और सारे आंकड़े हवा में तैर रहे हों और उंगलियों के इशारे पर उपलब्ध हों, तो मस्तिष्क को सूचनाओं का गोदाम बनाने की क्या आवश्यकता है?
पुरानी शिक्षा प्रणाली युवाओं को उन कार्यों के लिए प्रशिक्षित कर रही है जो आज से 10 वर्ष बाद अस्तित्व में ही नहीं रहेंगे। एक यंत्र किसी भी मनुष्य की तुलना में अधिक तेजी से, बिना किसी त्रुटि के और बिना किसी अवकाश के रटने और दोहराने वाले कार्य कर सकता है।
ऐसे में यदि कोई विद्यार्थी केवल तथ्यों को कंठस्थ करने पर अपनी ऊर्जा व्यय कर रहा है, तो वह एक ऐसी प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है जिसमें उसकी हार पहले से ही तय है। यह शिक्षा प्रणाली अब मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा और उसकी रचनात्मकता को मार रही है। यह मृत हो चुकी है और इस मृत ढांचे को ढोना भविष्य की पीढ़ियों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है।
इसलिये अगर बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहिये, तो उनकी परंपरागत पढ़ाई आज ही बंद करो और भविष्य के विज्ञान को पढ़ाओ ! तभी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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