जीवन में ईश्वर की कृपा को मापने का वास्तविक पैमाना क्या है? असीमित धन, कृत्रिम विलासिता या समाज में झूठा दिखावा? कदापि नहीं। परमेश्वर की सच्ची कृपा केवल उन सात शाश्वत स्तंभों में निवास करती है, दो वक्त की शुद्ध रोटी, तन ढंकने के लिए सम्मानजनक कपड़ा, आश्रय के लिए एक सुरक्षित मकान, स्वाभिमान से अर्जित आय का साधन, एक निरोगी काया, उत्तम स्वास्थ्य, निश्छल भावनात्मक संबंध, और जीवन को सार्थकता देने वाला आपका ‘कर्तव्य’।
यदि आपके जीवन में यह सात तत्व सहज रूप से विद्यमान हैं, तो मानकर चलिए कि आप पर उस विधाता की पूर्ण कृपा है और आप इस ब्रह्मांड के सबसे भाग्यशाली मनुष्यों में से एक हैं।
परंतु आज के मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह इस कृपा को पहचान नहीं पा रहा है। इन सात ईश्वरीय वरदानों के प्राप्त होने के बाद भी यदि आपका मन असंतुष्ट है, यदि आप मृगतृष्णा के समान और अधिक संचय की अंधी दौड़ में भटक रहे हैं, तो आप केवल अपना वर्तमान ही नष्ट नहीं कर रहे, बल्कि आप सीधे तौर पर ईश्वर को धोखा दे रहे हैं।
यह भटकाव उस परमपिता के प्रति घोर कृतघ्नता है। प्रकृति ने आपको पूर्णता के साथ जीवन जीने का अवसर दिया, लेकिन आप उसे बाजारवाद और झूठी लालसाओं की वेदी पर होम कर रहे हैं। ईश्वर ने आपको ‘पुरुषार्थ’ के लिए चुना था, ताकि आप अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें, न कि विलासिता का आजीवन दास बनने के लिए।
असीमित इच्छाओं का यह भटकाव केवल तंत्रिका तंत्र को थका देने वाले तनाव और आत्मा के पतन का कारण बनता है। जब विधाता ने आपको एक संतुलित जीवन जीने के सभी मूल संसाधन दे दिए हैं, तो इस अंधी दौड़ से बाहर आइए। स्वयं को पहचानिए। चुनौतियों के बीच से उदय होकर एक ‘राज ऋषि’ की भांति स्थिर, आत्म-निर्भर और प्रज्ञावान बनिए।
यदि आपकी जड़े इन सात आधारों पर मजबूती से टिकी हैं, तो अब कहीं और शांति मत खोजिए। ईश्वर की दी हुई इस प्राकृतिक पूर्णता को कृतज्ञता के साथ स्वीकार करें, मन का भटकाव त्याग कर ईश्वर से भीख मांगना बंद कीजिये और अपने वास्तविक कर्म के मार्ग पर अडिग होकर चलियह। ईश्वर की दी हुई पूर्णता में संतुष्ट रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी भक्ति है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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