आखिर विभीषण वैष्णव कैसे बना : Yogesh Mishra

उस समय राक्षस जैसी कोई प्रजाति नहीं हुआ करती थी ! रावण विद्वान होने के साथ-साथ कूटनीतिज्ञ भी था ! उसने वैष्णव संस्कृत की एक बड़ी कमजोरी पकड़ ली थी ! वह यह थी कि वैष्णव संस्कृति में जब कोई भी व्यक्ति वैष्णव जीवन शैली के विपरीत कोई भी कार्य करता था ! तब उसे वैष्णव राजा अपने राज्य से निकाल दिया करते थे और समाज में उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था ! अर्थात कोई भी व्यक्ति ऐसे बहिष्कृत व्यक्ति के यहां अपना कोई शादी संबंध आदि नहीं करता था और न ही उससे कोई बात या उसका सहयोग करता था !

रावण ने वैष्णव संस्कृत की इस कमजोरी का लाभ उठाया ! उसने कुबेर को लंका से भगा कर लंका पर अपना शासन जमा लिया ! इसके बाद पूरी दुनिया के बहिष्कृत लोगों को उसने लंका लाकर बसाना शुरू किया ! इसके पीछे उसका एक मात्र उद्देश्य यह था कि जो व्यक्ति जिस राज्य से बहिष्कृत करके निकाला गया है ! उसके मन में उस अपने राज्य के शासक के प्रति घृणा जरूर होगी ! रावण ने सोचा कि वह व्यक्ति जहां से बहिष्कृत करके निकाला गया है इसलिये उसके आक्रोश को हम प्रयोग करके उस राज्य पर उससे प्राप्त सूचना के आधार पर शासन जमा सकते हैं !

ऐसा बहिष्कृत व्यक्ति ही उस राज्य की सभी कमजोरियां को हमें स्वत: ही बतला देगा ! इस नियत और मनसा से रावण ने पूरी दुनिया के वैष्णव संस्कृत के सभी बहिष्कृत लोगों को लंका लाकर बसाया और उन्हें वह सभी सुविधाएं दी जो सामान्यतः वैष्णव संस्कृत में जन सामान्य को उपलब्ध नहीं थी !

इस कूटनीति का सहारा लेकर रावण ने धीरे-धीरे विश्व के लगभग सभी देशों के बहिष्कृत लोगों को श्रीलंका लाकर बसाया और इस प्रक्रिया को उसने “रक्ष संस्कृति” कहा ! जिसका तात्पर्य यह था कि आपको जब दुनिया ने अस्वीकार कर दिया हो तब हम आपकी रक्षा करेंगे और अपनी “रक्ष संस्कृति” में स्वीकार करेंगे !

आपको वह सब कुछ देंगे जो आपसे अब तक छीन लिया गया है ! इस तरह उसने धीरे-धीरे पूरे विश्व के लोगों में अपना विश्वास जागृत कर लिया और कालांतर में दुनिया से बहिष्कृत लोगों का समूह इकट्ठा करके उसने एक सशक्त सेना बनाई और उस सेना के माध्यम से पूरी दुनिया को जीत कर अपने कदमों में झुका लिया !

इस कार्य को करने में रावण को लगभग 27 वर्ष लग गये ! इस 27 वर्ष की यात्रा में रावण ने लंका का समस्त कार्य भार अपने छोटे भाई विभीषण को सौंपा रखा था क्योंकि कुंभकरण मूलतः वैज्ञानिक था ! उसके ऊपर विज्ञान विभाग का काफी भार था ! इसलिए शासन सत्ता का दायित्व रावण ने विभीषण को सौंपा था !

उस समय विभीषण जब लंका के कार्यवाहक शासक थे ! उसी समय वैष्णव प्रचारक नारद बार-बार लंका भ्रमण पर आया करते थे और उन्होंने विभीषण को यह विश्वास दिलाया कि भविष्य में वैष्णव संस्कृति ही पूरी पृथ्वी पर अपना एकाधिकार करेगी और नव उदित “रक्ष संस्कृति” का सर्वनाश हो जायेगा ! इसलिए तुम्हें विष्णु की शरण में जाना चाहिये ! भगवान श्री राम विष्णु के अवतार हैं इसलिये तुम उनकी शरण में रह कर वैष्णव जीवन शैली का अनुकरण करो !

इधर विभीषण की पत्नी गंधर्व राज्य के राजा महात्मा शैलूष की कन्या “सरमा” थी ! जिनसे विभीषण का विवाह हुआ था ! जहां गंधर्व राज्य में वैष्णव संस्कृत का बोलबाला था ! अतः पत्नी के परामर्श और दबाव में विभीषण वैष्णव संस्कृति को स्वीकार कर लिया ! जो वैष्णव की बड़ी सफलता थी !

क्योंकि इससे पूर्व भी इसी तरह हरणकश्यप के पुत्र प्रहलाद को भी नारद ने बरगला कर वैष्णव बना लिया था और प्रह्लाद के सहयोग से गुप्तचरों द्वारा हरणकश्यप की हत्या करवा दी थी और फिर प्रहलाद को राजगद्दी पर बिठा दिया था ! उसी कांड का हवाला देते हुये नारद ने विभीषण को समझाया कि यदि तुम वैष्णव संस्कृत के साथ रहोगे तो जब राम रावण का वध कर देंगे तब तुम्हें लंका का राजा बना दिया जायेगा ! वास्तव में हुआ भी यही  लंका के राज्य के लालच में विभीषण ने राम के साथ मिल कर रावण का उसके सभी उत्तराधिकारियों सहित हत्या करावा दी गयी और वैष्णव संस्कृति के पोषक विभीषण का राम ने लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक कर दिया !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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