धर्म और रिलीजन अंतर : Yogesh Mishra

प्राय: देखा गया है कि भारतीय भाषा के शब्द धर्म को मजहब, पंथ, मत या संप्रदाय, रिलीजन के समकक्ष माना जाता है ! जबकि धर्म का अर्थ समाज का वह नियम समूह जिसे समाज ने सामान्य स्वीकृति से धारण अर्थात स्वीकार कर लिया है और जो कि रिलीजन अर्थात रीजन, क्षेत्र विशेष में मान्यता प्राप्त नियम से कहीं अधिक व्यापक और अलग है !

धर्म पूरी तरह जीव और प्रकृति ही नहीं बल्कि इस ब्रह्माण्ड के कल्याण अनादि काल से क्रमबद्ध धीरे धीरे विकसित होने वाली प्रकृति के अनुकूल जीवन शैली की सर्व मान्यता प्राप्त व्यवस्था है ! जबकि अंग्रजों द्वारा आयातित शब्द रिलीजन का तात्पर्य क्षेत्र विशेष की जीवन शैली में मान्यता प्राप्त नियमों के समूह है जिसे दूसरा क्षेत्रीय समाज देश काल परिस्थिती मान्यता और जीवन शैली के आधार पर अस्वीकार कर सकता है ! पर धर्म सिधान्तों को नहीं !

 जैसे जो नियम बंगाल में मान्य हैं वह गुजरात में नहीं या जो नियम केरल में मान्य हैं वह बिहार में नहीं मान्य हैं क्योंकि दोनों स्थान की जीवन शैली और जलवायु अलग अलग है ! पर एक ही धार्मिक नियम बंगाल गुजरात केरल और बिहार में सभी जगह समान रूप से मान्यता प्राप्त हैं !

यह सारी गलत फहमी अंग्रेजों के भारत आने के बाद पैदा हुई ! यूरोपीय जातियों के लोग जब भारत में आये तो उन्होंने पाया कि भारत की सामाजिक व्यवस्था जो कि धर्म द्वारा संचालित थी वह योरोपीय जीवन शैली से अलग थी क्योंकि भारत में आतंरिक और प्राकृतिक विज्ञान का विकास योरोप के मुकाबले बहुत पहले ही हो चुका था ! जिसका ज्ञान के आभाव में वैज्ञानिक कारण यह साम्राज्यवादी योरोपीय नहीं समझ पाये और उन्होंने इसे क्षेत्रीय मान्यता घोषित कर दिया !

जिसका पश्चिम के अनुवादकों द्वारा कालांतर में अनुवाद रीजन से रीजनल और फिर रिलीजन हो गया क्योंकि पश्चिम के अनुवादकों को भारतीय धर्म की व्याख्या के लिये कोई ऐसा शब्द चाहिए था, जो धर्म की अवधारणा और अर्थ के समकक्ष हो और उनके श्रेष्ठ होने का अहंकार भी पोषित करता हो ! अत: उन्होंने लैटिन शब्द रिलीजीओ (religiō) से रिलीजन शब्द का निर्माण किया था !

जिसका अर्थ था क्षेत्र विशेष में देवताओं के प्रति सम्मान और भावना का प्रतीक नियम समूह ! इस तरह योरोपीय अल्प ज्ञानियों ने धर्म का अनुवाद रिलीजन कर दिया और धीरे-धीरे भारत में भी अंध अनुकरण के कारण धर्म को रिलीजन का पर्यायवाची ही मान जाने लगा ! जबकि यह सत्य नहीं है !

उच्चतम न्यायालय की न्यायपीठ के पीछे लिखा हुआ सिधान्त ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ ! यह महाभारत में कुल ग्यारह जगह आता है और इसका मतलब है “जहाँ धर्म है वहाँ विजय निश्चित है ! यहाँ धर्म का तात्पर्य समाज द्वारा स्वीकृत प्राकृतिक सिधान्त से है, न कि किसी क्षेत्रीय मान्यता से !

धर्म शब्द की मूल धातु ‘धृ’ है जिसका अर्थ है-धारण करना ! भारतीय वांगमय के अनुसार धर्म शब्द का सर्व मान्यता प्राप्त धर्म ग्रंथों में बार-बार आया है ! जहाँ मानवता ही नहीं प्रकृति के कल्याण के लिये सभी समाज में सामाजिक जीवन शैली का आधार ही धर्म माना गया है ! इसलिये धर्म का पर्यायवाची या अनुवाद कभी भी रिलीजन नहीं हो सकता है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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