अवतारवाद का विज्ञान : Yogesh Mishra

 अवतार के विषय में कोई भी चर्चा करने के पहले यह जान लेना बहुत आवश्यक है कि अवतार का वर्णन न तो वेदों में मिलता है और न ही वेदांत में !

 इसी तरह अवतार का वर्णन न तो सनातन दर्शन में मिलता है और न ही उपनिषदों में ! यहां तक की श्रीमद भगवत गीता में भी अवतार का कोई वर्णन नहीं मिलता है !

 अवतार की अवधारणा गुप्त काल में पुराणों में लिखी गई है ! जिसे सामान्य भाषा में प्रकटीकरण कहा जा सकता है !

अर्थात जब कोई ऊर्जा हमारी इंद्रियों द्वारा हमें अनुभूत नहीं होती है, तब वह ऊर्जा अपने आप को अनुभूत कराने के लिए किसी शरीर को माध्यम बना लेती है ! ऐसी स्थिति में जिस शरीर को ऊर्जा माध्यम बनाती है, हम लोग दुर्भाग्यवश उस शरीर को ही अवतार मानने लगते हैं !

जबकि वास्तव में वह शरीर मात्र एक माध्यम है, किसी दिव्य ऊर्जा का अवतार नहीं है बल्कि उस शरीर के अंदर जो ऊर्जा प्रगट हो रही है, वह एक दिव्य ऊर्जा है, जो कभी भी किसी दूसरे शरीर में प्रगट हो सकती है !

गोस्वामी तुलसीदास ने तो राम को अवतार माना ही है, उन्होंने रावण को भी अवतार माना है ! क्योंकि उनका यह मानना है कि यह दो दिव्य ऊर्जायें थीं, जो इस पृथ्वी पर लीला करने के लिए प्रकट हुई थी !

इसको दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि ब्रह्मांड में व्याप्त कोई भी दिव्य ऊर्जा जिस शरीर के माध्यम से प्रकट होती है, आम जनमानस उस शरीर को अवतार मान लेता है जबकि वह एक सामान्य शरीर है और उसके अंदर प्रकट होने वाली ऊर्जा इस अनंत ब्रह्मांड का अंश है !

जोकि अपने किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस शरीर के माध्यम से प्रकट हो रही है ! जो कभी भी इस शरीर को छोड़ कर किसी अन्य शरीर में प्रगट हो सकती है ! लेकिन हम लोग उस ऊर्जा को अनुभूत नहीं कर पाते हैं अत: उस शरीर को ही अवतार मान लेते हैं ! जिसके माध्यम से वह दिव्य ऊर्जा प्रकट हो रही होती है !

इस तरह शरीर के अंदर दिव्य ऊर्जाओं का प्रगटीकरण भी क्षणिक किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए होता है ! जैसे भगवान श्री कृष्ण के शरीर में महाभारत युद्ध के समय महाकाल के अंश के रूप में दिव्य ऊर्जा का प्रगटीकरण हुआ था ! जिसके प्रभाव से उन्होंने अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का दिव्य ज्ञान दिया था ! क्योंकि वही दिव्य ज्ञान दोबारा आग्रह करने पर कृष्ण अर्जुन को युद्ध समाप्त होने के बाद नहीं दे पाए थे !

 इसको जनसामान्य की भाषा में इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे किसी शरीर के माध्यम से कोई भूत-प्रेत, पिशाच आदि अपनी अभिव्यक्ति किसी शरीर के माध्यम से प्रगट करता है, ठीक इसी तरह दिव्य उर्जायें भी किसी शरीर को माध्यम बना कर समय समय पर प्रगट होती हैं !

अत: इसे अध्यात्म की भाषा में प्रगटीकरण कहा जाता है ! जो आज यहां प्रकट हुआ है, वह कल कहीं और भी प्रकट हो सकता है ! लेकिन हम अल्प बुद्धि के कारण सामान्य व्यक्ति जिस शरीर में वह ऊर्जा प्रकट होती है, उसी शरीर को पूजने लगता है ! जिससे वह सामान्य व्यक्ति भी भगवान बन जाता है !

 और फिर उस सामान्य व्यक्ति को महिमामंडित करने के लिए तरह-तरह की कहानियां, कथायें, चालीसा, स्त्रोत, आरती आदि का निर्माण कर दिया जाता है और उस सामान्य व्यक्ति की मूर्ति को मंदिर में रखकर उसकी पूजा शुरु कर दी जाती है ! इस तरह एक सामान्य व्यक्ति भगवान हो जाता है !

जैसे आजकल भीमराव अंबेडकर जी को भगवान बनाने का प्रयास किया जा रहा है ! ऐसे ही कभी राम और कृष्ण को भी भगवान बनाने का प्रयास किया गया रहा होगा ! जिन्हें आज हम लोग मंदिरों में मूर्ति रखकर पूज रहे हैं !

 यही अवतारवाद का विज्ञान है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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