चोल वंशियों ने बनाया था भारत को सोने की चिड़िया : Yogesh Mishra

300 ईसा पूर्व से 13वीं सदी चोल वंशियों का दक्षिण भारत पर शासन था ! अर्थात 1600 वर्षों तक कावेरी नदी घाटी में इस राजवंश ने शासन किया था और इनकी राजधानी तमिलनाडु स्थित वरायूर (अब तिरुचिरापल्ली) थी ! चोल राजवंश तमिलनाडु से आंध्र तक फैला हुआ था ! यह भगवान शिव के भक्त थे और अपने को रक्ष संस्कृति का प्रतिनिधि बतलाते थे ! इनकी शासन व्यवस्था रावण की शासन नीति के अनुरूप थी ! मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी इनका जिक्र मिलता है !

ज्ञानत इतिहास में विजयालय चोल 848-871 से राजेन्द्र चोल 1246-1279 तक का क्रमबद्ध इतिहास मिलाता है ! चोल नरेशों ने भारत के व्यवस्थित विकास के लिये कुएँ और तालाब खुदवाये और नदियों के प्रवाह को रोककर पत्थर के बाँध से घिरे जलाशय (डैम) बनवाया ! करिकाल चोल ने कावेरी नदी पर बाँध बनवाया था !

राजेंद्र प्रथम ने गंगैकोंड-चोलपुरम् के समीप एक झील खुदवाई जिसका बाँध 16 मील लंबा था ! इसको दो नदियों के जल से भरने की व्यवस्था की गई और सिंचाई के लिए इसका उपयोग करने के लिए पत्थर की प्रणालियाँ और नहरें बनाई गईं। आवागमन की सुविधा के लिए प्रशस्त राजपथ और नदियों पर घाट भी निर्मित हुए !

आर्थिक जीवन का आधार कृषि थी। भूमिका स्वामित्व समाज में सम्मान की बात थी। कृषि के साथ ही पशुपालन का व्यवसाय भी समुन्नत था। स्वर्णकार, धातुकार और जुलाहों की कला उन्नत दशा में थी। व्यापारियों की अनेक श्रेणियाँ थीं जिनका संगठन विस्तृत क्षेत्र में कार्य करता था। नानादेश-तिशैयायिरत्तु ऐज्जूरुंवर व्यापारियों की एक विशाल श्रेणी थी जो वर्मा और सुमात्रा तक व्यापार करती थी।

चोल सम्राट मुख्यतः शिव के उपासक थे, लेकिन उनकी नीति धार्मिक सहिष्णुता की थी ! अत: इन्होंने बौद्धों को भी दान दिया ! इनके साम्राज्य में जैन भी शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन और प्रचार करते थे ! पूर्वयुग के तमिल धार्मिक पद वेदों जैसे पूजित होने लगे और उनके रचयिता देवता स्वरूप माने जाने लगे थे !

 नंबि आंडार नंबि ने सर्वप्रथम राजराज प्रथम के राज्यकाल में शैव धर्मग्रंथों को संकलित किया ! शैवों में भक्तिमार्ग के अतिरिक्त बीभत्स आचारों वाले कुछ संप्रदाय, पाशुपत, कापालिक और कालामुख जैसे वाममार्गी आराधना पद्यतियों को भी शामिल लिया लेकिन इनके विकृत स्वरूप के कारण इन्हें अधिक बढ़ावा नहीं दिया !

इनके शासन काल में मंदिर उपासना स्थल के साथ साथ शिक्षा के केंद्र भी थे। त्योहारों और उत्सवों पर इनमें गान, नृत्य, नाट्य और मनोरंजन के आयोजन भी होते थे। मंदिरों के स्वामित्व में भूमि भी होती थी और कई कर्मचारी इनकी अधीनता में होते थे। यह व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु बैंक का कार्य भी करते थे। कई उद्योगों और शिल्पों के व्यक्तियों को मंदिरों के कारण जीविका मिलती थी।

इन्होंने 2000 से अधिक मंदिरों का निर्माण करवाया था ! जिसमें 13 लाख से अधिक छात्र पढ़ते थे ! जिन्हें हजारों आचार्य पढ़ते थे ! जो देश विदेश में जाकर तमिल शैव ज्ञान का प्रचार प्रसार करते थे ! जिससे जनता के मध्य रक्ष संस्कृत के अनुसार सैनिक कला, वाणिज्य कला, धर्म नीति, राजनीति, कूटनीति, आयुर्वेद, तंत्र, ज्योतिष, भूगोल आदि के विषयों का प्रचार प्रसार का प्रशिक्षण व  शिक्षण कार्य हुआ करता था !

यही ज्ञान भारत के संपन्नता का आधार था ! इसी ज्ञान की वजह से भारत के सोने की चिड़िया बनने का क्रम शुरू हुआ और इस विकास क्रम को आगे मौर्य तथा गुप्त काल में जारी रखा गया ! तब जाकर भारत सोने की चिड़िया बन पाया !

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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