मनुष्य ने अपने सामाजिक गिरोह बनाने के लिये हजारों तरह की ध्यान पद्धतियां विकसित की हैं और मनुष्य का यह अप्राकृतिक कार्य मानव सभ्यता के विकसित होने के साथ-साथ ही आरंभ हो गया था !
इसीलिए मनुष्य में हजारों तरह की अलग-अलग ध्यान पद्धतियां विकसित की हैं ! जबकि ध्यान का एक मात्र उद्देश्य है “स्व” में स्थिर हो जाना !
लेकिन व्यक्ति स्व में स्थित कैसे होगा ! इसके लिए प्रकृति ने बहुत सरल व्यवस्था मनुष्य को प्राकृतिक रूप से दी है ! वह है देववाणी ध्यान पद्धति !
अब प्रश्न यह है कि यह देववाणी ध्यान पद्धति क्या है ?
आपने बचपन में देखा होगा छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें कोई मंत्र, मुद्रा आदि का ज्ञान नहीं होता है, वह प्राय: लेटे-लेटे ही तरह-तरह की आवाज निकालने लगते हैं !
कोई बच्चा री. री. री. करता है, तो कोई बच्चा ल. ल. ल. करता है, आदि आदि ! जिसे हम लोग अज्ञानता वश बच्चे का खेलना मान लेते हैं !
लेकिन बच्चे की यह स्थिति उसका खेलना या मनोरंजन मात्र नहीं है बल्कि परिवेश वश जो नकारात्मक ऊर्जा उसके मन मस्तिष्क में प्रवेश कर गई है, उसे वह इस तरह के स्वर उच्चारण के द्वारा अपने मन मस्तिष्क से बाहर निकालता है !
जो व्यक्ति के बड़े होने के साथ-साथ समाज को महत्त्व देने के कारण संकोचवश धीरे धीरे विलुप्त हो जाती है ! और यदि कोई व्यक्ति बड़े होने पर भी इस तरह की गतिविधि करता है, तो उसे लोग मानसिक रोगी या अनुशासन हीन मान लेते हैं !
जबकि यह सामर्थ हमें प्रकृति द्वारा मन मस्तिष्क से नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने के लिए प्रदान किया गया है ! जिसमें हम सतही चेतन मन को शिथिल करके, अचेतन मन से बोल कर नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकाल देते हैं !
यह प्रक्रिया हमारे शरीर में स्वत: ही होती है ! इसे करने के लिए हमें कहीं कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है ! लेकिन प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस प्रतिभा को हम समाज और लोक व्यवहार के प्रभाव में धीरे-धीरे विलुप्त कर लेते हैं !
मनुष्य की यही नकारात्मक ऊर्जा को मन मस्तिष्क से निकालने की प्रकृतिक ध्यान पद्धति ही देववाणी ध्यान पद्धति कही गई है !
जब व्यक्ति इस तरह की देववाणी ध्यान अवस्था में चला जाता है, तब उसके मन मस्तिष्क के अंदर जिस तरह की नकारात्मक ऊर्जा विकसित हो रही होती है ! उसके अनुरूप उसकी स्वर इंद्री स्वत: ही स्वर का उच्चारण करके उस नकारात्मक ऊर्जा को मन मस्तिष्क से बाहर निकाल देती है ! जिससे व्यक्ति असीम आनंद के सुख को प्राप्त करता है !
इसके लिए मनुष्य को कृत्रिम रूप से अतिरिक्त कोई भी प्रयास नहीं करना पड़ता है ! इसीलिए इसे प्रकृति का सबसे पुरातन और स्वाभाविक ध्यान पद्धति माना गया है ! जिसका प्रयोग शैव जीवन शैली में अनादिकाल से किया जाता रहा है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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