अनुयाई होने का अर्थ : Yogesh Mishra

 किसी भी महापुरुष का अनुयाई होने का अर्थ नकल करना नहीं है ! किंतु यथार्थ में यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति जिस महापुरुष के विचारों के अनुगमन का दावा करता है, वह अपनी वेशभूषा और जीवनशैली भी उसी जैसा बनाने का प्रयास करने लगता है ! जो कि नितांत गलत है !

 कोई बीसवीं सदी के महान दार्शनिक ओशो का अनुगमन करते करते उसकी तरह दाढ़ी मूछें बढ़ाकर घूमने लगता है, तो कोई महावीर जैन जैसे दार्शनिक का अनुगमन करते करते बिना किसी कारण के समाज में नंगा होकर घूमने लगते हैं !

 कोई गौतम बुद्ध की तरह भगवा कपड़े लपेटकर घूमने लगता है, तो कोई किसी अन्य महापुरुष की तरह अपने को दिखाने के चक्कर में अपनी मौलिकता को छोड़कर उस जैसा बनने का प्रयास करता है !

जबकि ईश्वर ने हर व्यक्ति को अलग-अलग कार्य के लिए अलग-अलग उद्देश्य से बनाया है ! कभी कोई भी व्यक्ति सृष्टि के आदि से अंत तक दूसरे जैसा बन ही नहीं सकता है, और सच्चाई तो यह है कि जब हम दूसरे जैसा बनने की कोशिश करते हैं, तो हम अपनी मौलिकता को खो देते हैं, जो ईश्वर का एक वरदान है !

इसलिए किसी का भी अनुगमन करो, लेकिन अपनी मौलिकता को मत छोड़ो ! हम किसी का अनुगमन मात्र इसलिए करते हैं क्योंकि हम अपनी मौलिकता को पहचान नहीं पाते हैं !

 और जब कोई व्यक्ति अपनी ही मौलिकता को नहीं पहचान पाया जो जन्म के पूर्व से उसे ईश्वर की कृपा रूप में प्राप्त है, तो वह किसी और का अप्राकृतिक अनुगमन करके ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकता है ! यह ईश्वर के साथ धोखा है !!

 यह एक बहुत सहज प्रश्न है ?

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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