जीव की चेतना के विकास के सात चरण  : Yogesh Mishra

वेदों के अनुसार जन्म और मृत्यु के बीच जीव के विकास की तीन अवस्थाएं हैं ! जो अनवरत और निरंतर चलती रहती हैं ! वह तीन अवस्थाएं हैं : जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति !

यह क्रम इस प्रकार चलता है ! जागा हुआ व्यक्ति जब पलंग पर सोता है तो पहले स्वप्निक अवस्था में चला जाता है फिर जब नींद गहरी होती है तो वह सुषुप्ति अवस्था में होता है। इसी के उल्टे क्रम में वह सवेरा होने पर पुन: जागृत हो जाता है।

इसी तरह कुछ व्यक्ति एक ही समय में उक्त तीनों अवस्था में भी रहते हैं। कुछ लोग जागते हुए भी स्वप्न देख लेते हैं अर्थात वे गहरी कल्पना में चले जाते हैं।

जो व्यक्ति उक्त तीनों अवस्था से बाहर निकलकर खुद का अस्तित्व कायम कर लेता हैं ! उन्हें तुरीय अवस्था या ‍ब्राह्मी चेतन अवस्था कहते हैं ! जिसे वैष्णव भगवत चेतन अवस्था कहते हैं !

जागृत अवस्था में व्यक्ति अपने इंद्रिय भोग के लिए संसार में रमण करता है ! स्वप्न अवस्था में व्यक्ति संसार में नहीं बल्कि अपने इंद्रिय भोग के लिये अपने मन में ही रमण करता है !

किन्तु गहरी नींद में व्यक्ति पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित स्वयं में विश्राम करते हुये ! पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा और पांच कर्मेंन्द्रियां वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु को भी विश्राम देता है ! जीव के इस अवस्था को सु‍षुप्ति अवस्था कहा जाता है ! जीव की यह तीनों अवस्थायें स्वाभाविक हैं !

चेतना की चौथी अवस्था तुरीय अवस्था है ! जिसे प्रयासों से प्राप्त किया जाता है ! यह निर्गुण और निराकार अवस्था है ! यह चेतना की आधार अवस्था है ! यहीं से जीव की आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है ! इसके पहले की सभी अवस्था मन का भ्रम है !

तुरीय अवस्था के पार पहला कदम तुरीयातीत अवस्था है ! यह तुरीय अवस्था के स्थाई हो जाने के बाद आती है ! चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को हम योगी कहते हैं ! इसे ही भगवा धारण करने का अधिकार है ! इसके पहले के किसी भी साधक को नहीं !

इस तुरीयातीत अवस्था में व्यक्ति को स्थूल शरीर या इंद्रियों के पोषण के लिये किसी भी वाह्य संसाधन की आवश्यकता नहीं होती है ! इसे सहज-समाधि भी कहते हैं ! अर्थात बिना किसी प्रयास के बार-बार समाधि में प्रवेश कर जाने की अवस्था !

इसके बाद आती है जीव की सिद्ध चेतन अवस्था ! इस अवस्था में व्यक्ति से प्रकृति का कोई भी रहस्य छुपा नहीं रहता है ! वह ईश्वर के कार्य कारण व्यवस्था को पूरी तरह समझने लगता है और वह संपूर्ण जगत को ईश्वर की सत्ता मानते हुये जीवन यापन करता है ! यह संन्यास की अवस्था है !

अर्थात यहां पर व्यक्ति को संसार न्यास की भांति लगने लगता है और स्वयं को व्यक्ति इस ईश्वर के बनाये हुये संसार में न्यासी के रूप में देखने लगता है ! इसीलिए ऐसे व्यक्तियों को संन्यासी कहा जाता है ! यह एक महान सि‍द्ध योगी की अवस्था है !

इसके बाद आती है जीव की ब्रह्म अवस्था ! यहाँ जीव और ब्रह्म का भेद मिट जाता है ! अहम् ब्रह्मास्मि और तत्वमसि जैसे उदघोष व्यक्ति इसी अवस्था में पहुँच कर करता है ! यह जीव के परम मुक्ति की अवस्था है !

अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं और यह संपूर्ण जगत ही मुझे ब्रह्म स्वरूप नजर आता है ! यह उदघोष व्यक्ति के पूर्ण होने की घोषणा है ! यह जीव की परम मुक्त अवस्था है ! यहां पर व्यक्ति ईश्वर के कार्य कारण व्यवस्था के भोग  अर्थात प्रारब्ध की ऊर्जा से भी परे चला जाता है !

इस तरह यह जीव की चेतना के विकसित होने के सात अलग-अलग चरण है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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