“अहम् ब्रह्मास्मि” का उद्घोष साधक की यह उद्घोषणा है कि उसने अपने मन को साधते-साधते अब मन के स्तर पर तुरीय की अवस्था को प्राप्त कर लिया है !
अर्थात वह जीव जिसने कभी कामना और वासना के प्रभाव में पिंड धारण किया था ! वह अब कामना और वासना से स्वतंत्र है ! अब उसका पिण्ड इस संसार में मन और इन्द्रियों के नियंत्रण में नहीं है !
“अहम् ब्रह्मास्मि” यह उद्घोषणा ठीक उसी तरह है, जैसे कोई व्यक्ति संन्यास ले लेने के उपरांत भगवा वस्त्र धारण करके समाज को यह सूचना देता है कि अब उसने ईश्वर कार्य कारण की व्यवस्था के रहस्य को समझ लिया है !
अर्थात अब उसकी संसार के किसी भी भोग में कोई रुचि शेष नहीं है ! वह व्यक्ति यह समझ गया है कि यह संसार नश्वर है और उसके अंदर बैठा हुआ जीव ही शाश्वत ईश्वर का अंश है ! इसलिए अब उसकी इस संसार को भोगने की कोई भी इच्छा शेष नहीं रह गई है !
जीव को इस तुरीय अवस्था के प्राप्त साधना उसके मन के चौथे चरण की साधना है ! जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इसके बाद मन की चौथी अवस्था तुरीय की अवस्था है !
किंतु संसार का सामान्य इन्सान तो प्रथम अवस्था को ही प्राप्त नहीं कर पाता है अर्थात जागृत की अवस्था को !
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपना संपूर्ण जीवन एक नशे में गुजार देता है ! किसी को ऑफिस जाने का नशा है, तो किसी को दुकान जाने का नशा ! किसी को धन कमाने का नशा है ! तो किसी को प्रतिष्ठा प्राप्त करने का नशा है !
मनुष्य की यह अवस्था उसे वाह्यदर्शी बनाती है ! इसीलिए मनुष्य पूरे जीवन भर अपने अंदर के किसी भी अवस्था को नहीं जान पाता है ! सच्चाई तो यह है कि मनुष्य पूरे जीवन अपने विचारों की गति को ही नहीं जा पाता है !
इसीलिए वह पूरा जीवन जीने के बाद भी मृत्यु के अंतिम क्षण तक कामना और वासना की अज्ञानता में भटकता रहता है ! जो व्यक्ति संवेदनशील जागृत अवस्था में जीवन को नहीं जीता है ! वह कभी भी ईश्वर के रहस्य को आत्मसात नहीं कर पाता है !
और जिसने ईश्वर के रहस्य को अपनी संवेदनाओं से नहीं जाना, वह कभी भी दृष्टा नहीं बन सकता है और जो दृष्टा नहीं बन सकता है ! वह तुरीय की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता है !
और जिसने तुरीय अवस्था को प्राप्त नहीं किया ! उसे कभी अहम् ब्रह्मास्मि का उद्घोष करने का अधिकार नहीं है ! चाहे वह शास्त्रों का कितना भी मर्मज्ञ ज्ञाता क्यों ना हो ! जिस व्यक्ति ने शास्त्रों के शब्दों के पीछे के भाव की अनुभूति को अपनी संवेदनाओं से आत्मसात नहीं किया है ! उसके द्वारा पढ़ा गया शास्त्र व्यर्थ है !
क्योंकि ज्ञान शास्त्रों के शब्दों में नहीं बल्कि जिस भाव से वह शब्द लिखे गये हैं, उनकी संवेदनशील अनुभूति में है !
इसी को दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जीव की तुरीय अवस्था ही उसे ब्रह्म की अनुभूति करवाती है ! इस अवस्था को प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को शत्त जीवन भर अपने मन की गति को संवेदनशील साधना से जोड़ना पड़ता है ! तब जीव तुरीय अवस्था में प्रवेश कर पाता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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