श्री शब्द का सबसे पहले ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है ! अनेक धर्म पुस्तकों में लिखा गया है कि ‘श्री’ शक्ति का सूचक है ! श्री अर्थात जिस व्यक्ति में विकास करने की और खोज की शक्ति होती है ! वह श्री को प्रयुक्त करने का अधिकारी माना जाता है !
परमात्मा को वेद में अनंत श्री वाला कहा गया है ! सीमित शक्तियों के कारण मनुष्य अनंत-धर्मा नहीं है, इसलिए वह असंख्य श्री का अधिकारी तो नहीं हो सकता है !
लेकिन इस संसार में सीमित समर्थ के अनुसार पुरुषार्थ से ऐश्वर्य हासिल करके वह “श्रीमान” अर्थात अपने जैसे सामान्य व्यक्तियों के मध्य श्रेष्ठ जरुर बन सकता है ! सत्य तो यह है कि जो व्यक्ति पुरुषार्थ नहीं करता है ! वह श्रीमान कहलाने का अधिकारी नहीं है !
लेकिन सदैव से मनुष्य की मानसिक भ्रांति के कारण पुरुषार्थ को नापने के पैमाने सांसारिक उपलब्धता से गिने जाते हैं !
अर्थात जो व्यक्ति संसार में किसी भी कारण से सफल नहीं हो पाता है, उसे पुरुषार्थहीन मान लिया जाता है और जो व्यक्ति संसार में दूसरों के मुकाबले सफल हो जाता है ! उसे पुरुषार्थ मान मान लिया जाता है !
जबकि व्यावहारिक जगत में यह दोनों ही अवधारणाएं गलत हैं क्योंकि व्यक्ति के सफल होने या असफल होने का संबंध उसके पुरुषार्थ से नहीं है ! बहुत से लोग जीवन में बहुत पुरुषार्थ करते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते हैं !
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि पुरुषार्थ यदि इस संसार में सही दिशा में, सही युक्ति से, सही समय पर, सही संसाधनों के साथ नहीं किया गया है, तो ऐसा व्यक्ति इस संसार में पदार्थों का संग्रह नहीं कर पाता है ! जो कि किसी भी व्यक्ति के असफल होने की सूचना है ! जिसे समाज भ्रम वश पुरुषार्थहीन पुरुष मान लेता है !
दूसरी तरफ ऐसे व्यक्ति भी मिलते हैं जो अपने पुरुषार्थ का प्रयोग सही दिशा में, सही समय पर, सही युक्ति से करते तो हैं और संसार में बहुत से पदार्थों का संग्रह भी कर लेते हैं ! लेकिन लोभ ही प्रवृत्ति का न होने के कारण उनके द्वारा अर्जित पदार्थ का संग्रह समाज को दिखाई नहीं देता है ! जिस कारण भी लोग उन्हें पुरुषार्थहीन पुरुष मान लेते हैं !
इसलिए इस अव्यवहारिक संसार में “श्री” की उपलब्धि पाने के लिए व्यक्ति का लोभी होना भी आजकल की सामाजिक आवश्यकता है ! लेकिन श्री शब्द के संबोधन के लिए संसार की गलत अवधारणाओं के कारण व्यक्ति के लोभी होने की अनिवार्यता गलत है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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