जिनेवा के अनुसार भारत की वार्षिक आत्महत्या दर 1,00,000 के पीछे 10.5 प्रति है ! यह पूरी दुनियां में सर्वाधिक है ! जो वार्षिक आत्महत्या दर प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है ! यह चौकाने वाला आकंडा यह बतलाता है कि भारत में युवा पीढ़ी अत्यधिक अवसाद में है ! उसे तत्काल संवाद/ कंसलिंग की आवश्यकता है !
आत्महत्या के मानसिक, सामाजिक, साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल एवं जेनेटिक कारण होते हैं। जिन परिवारों में पहले भी आत्महत्या हुई है, उनके बच्चों द्वारा यह रास्ता अपनाने की आशंका ज्यादा होती है।
रिसर्च में सामने आया कि जिनमें आत्महत्या के जीन होते हैं, उनमें बायोकेमिकल परिवर्तन हो जाते हैं। इससे बच्चे या व्यक्ति का मानसिक संतुलन अव्यवस्थित हो जाता है। इसके कई कारण होते हैं जैसे तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग इत्यादि।
जिन बच्चों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। निजात के लिए आत्महत्या के कारण उससे ग्रसित मरीज के लक्षण एवं भविष्य में उसकी पुनरावृति न हो, इसका भी ध्यान रखा जाए। युवा वर्ग युवावस्था संक्रमण काल है, जिसमें युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि। जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है।
इन सब परिस्थितियों से वह जैसे तैसे निकलता है तो परिवार की जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाता है। फिर अर्थहीन प्रतिस्पर्धा और सामाजिक व नैतिक मूल्यों में गिरावट, परिवार का टूटना, अकेलापन धीर धीरे आत्महत्या की तरफ प्रेरित करता है।
युवक आत्महत्या के बारे में ज्यादा बात करने लगता है। कई बार आत्महत्या करने की कोशिश करता है और सिगरेट, शराब या अन्य नशा ज्यादा करता है। ऐसा व्यक्ति बहुत ज्यादा दुखी रहने लगता है और अनिद्रा का शिकार हो जाता है। ऐसे लक्षण होने पर बगैर देर किए डॉक्टर से संपर्क करें।
ऐसे व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और उसे हर प्रकार से सहयोग दें। उसके पास नशीली दवाइयां न छोडें और कोई धारदार हथियार न रखें। कोई पतली रस्सी या ब्लेड भी यहां वहां न पड़ी रहने दें। इलाज के बाद भी उनको देखरेख में रखें, क्योंकि वह आत्महत्या का प्रयास दोबारा भी कर सकते हैं।
अगर वह काम पर जाना बंद कर दें और बात बात पर चिढ़ने लगें तो उसके दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाने की कोशिश करें। जरूरत पड़े तो स्वयं उसके कार्यालय या स्कूल जाकर बात करें। इसके लिये स्वयं सेवी संस्थाओं को आगे आना होगा !
आज युवाओं के साथ संवाद और काउंसलिंग को बहुत जरुरत है ! जिस हेतु सनातन ज्ञान पीठ निकट भविष्य में संवाद / काउंसलिंग केंद्र की स्थापना करने जा रही है ! जिससे युवाओं को आत्महत्या के दुश्चक्र से मुक्त किया जा सके !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये
