(आध्यात्मिक कारण)
प्राय: व्यक्ति विचारों के न मिलने पर अनावश्यक रूप से किसी अन्य का विरोध करना शुरू कर देता है और व्यक्ति जिस व्यक्ति का विरोध करता है, वह अधिक सक्षम व्यक्ति होता है !
किसी व्यक्ति का अधिक सक्षम होना इस बात की सूचना है कि वह व्यक्ति संसार को बहुत अच्छी तरह से समझता है और उस पर ईश्वर की विशेष कृपा है !
और विरोध करने वाला जिस सक्षम व्यक्ति का व्यक्ति विरोध करता है तो विरोध करने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से उस सक्षम व्यक्ति के कम बौद्धिक समझ रखता है, इसीलिए वह सक्षम व्यक्ति का विरोध कर रहा है !
इसे दूसरे शब्दों में इस तरह भी समझना चाहिये कि जिस व्यक्ति पर ईश्वर की विशेष कृपा है, इसका विरोध करने वाला व्यक्ति अनावश्यक रूप से ईश्वर की कृपा का विरोध करता है !
इसीलिए प्राय: यह अनुभव में देखा जाता है कि विरोध करने वाले व्यक्ति के जीवन का संघर्ष बिना किसी कारण के बढ़ जाता है क्योंकि वह ईश्वर से कृपा प्राप्त व्यक्ति का विरोध कर रहा होता है !
दूसरी तरफ विरोध करने वाला व्यक्ति अपना समय और ऊर्जा दोनों ही एक ऐसे कार्य में लगता है, जिससे उस व्यक्ति को कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं होता है !
अगर इतना ही समय और ऊर्जा विरोध करने वाला व्यक्ति अपने जीवन के निर्माण की दिशा में लगाये तो उसका जीवन अधिक व्यवस्थित, संघर्ष विहीन और उन्नत होगा !
इसिलये व्यक्ति को किसी के विरोध में अनावश्यक समय और ऊर्जा नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा विरोध करने वाला व्यक्ति स्वयं अपने ही सर्वनाश का मार्ग खोज लेता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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