बड़े-बड़े संस्थानों को चलाने वाले प्रबुद्ध व्यक्तियों का यह अनुभव है कि संस्था में प्रत्येक 3 वर्ष में संस्था को अपनी कार्य नीति में बड़ा बदलाव कर देना चाहिए ! जिससे संस्था के नाम पर व्याप्त भ्रष्टाचार उभर कर सामने आ जाता है !
साथ ही अनुभवी जन का यह भी कहना है कि प्रत्येक संस्था को प्रत्येक 3 वर्ष में अपने संस्थान से जुड़े हुए प्रत्येक व्यक्ति की समीक्षा अवश्य करनी चाहिए !
अन्यथा लंबे समय से संस्थान से जुड़े हुए विश्वासघाती लोग संस्थान को दीमक की तरह अंदर-अंदर खोखला कर देते हैं !
यह संसार स्वार्थी के लोगों से भरा पड़ा है और हर तरह के व्यक्ति समय-समय पर संस्थान से जुड़ते रहते हैं ! जो आत्म कल्याण की इच्छा से जुड़े हैं ! वह आत्म कल्याण की साधना करेंगे !
लेकिन लगभग 3 वर्षों में 20% लोग संस्थानों से अपने निजी स्वार्थ के कारण जुड़ जाते हैं ! जो संस्थान के साथ विश्वास घात करते ही हैं !
ऐसे 20% लोगों की न तो संस्थान में कोई आस्था होती हैऔर न ही वह अपने आत्म कल्याण की इच्छा रखते हैं ! ऐसे स्वार्थी व्यक्तियों की प्रत्येक 3 वर्ष में समीक्षा करके उन्हें संस्थान के बाहर निकाल देना चाहिए !
जिस संस्थान पुनर्जीवित हो जाता है और अपनी नई ऊंचाइयों को प्राप्त करता है !
यदि प्रत्येक 3 वर्ष में संस्थान की साफ सफाई नहीं की जाएगी, तो यह 20% लोग ही संस्थान के लिए निरंतर समस्या बने रहेंगे और अंततः समाज में संस्थान की छवि खराब करके संस्थान को नुकसान पहुचायेंगे !
इसलिए प्रत्येक 3 वर्ष में संस्थान की साफ सफाई अवश्य रूप से करते रहना चाहिए !!
