वैष्णव आचार्यों द्वारा बतलाया गया है कि बीजाक्षर मंत्रों का बहुत महत्व है, क्योंकि यह मंत्र शक्तिशाली ऊर्जा के स्रोत होते हैं। यह मंत्र किसी विशेष देवता या शक्ति को समर्पित होते हैं ! इनका जप करने से उन शक्तियों की कृपा प्राप्त होती है।
जैसे
ह्रीं: – यह देवी (शक्ति) का बीज मंत्र है।
श्रीं: – यह धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का बीज मंत्र है।
ऐं: – यह विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती का बीज मंत्र है।
क्लीं: – यह आकर्षण और प्रेम का बीज मंत्र है। आदि आदि
किंतु यह सभी बीजाक्षर मंत्र हमारे वैष्णव ऋषियों, मुनियों, आचार्यों द्वारा अपने निजी ज्ञान और तपोबल से किसी विशेष उद्देश्य के लिये जाने गये मंत्र हैं ! जिसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह सब विद्वान पूर्वजों द्वारा निर्मित या खोजे गये महा शक्तिशाली बीजाक्षर मन्त्र हैं !
किन्तु शैवों में ऐसा नहीं है ! शैव अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा जाग्रत करने के लिये मात्र प्राकृतिक स्वर, नाद, ध्वनि का ही प्रयोग करते हैं !
शैवों का यह मानना है कि जब भी कोई ऋषि, मुनि, आचार्य किसी भी बीजाक्षर की खोज करता है, तो उसके पीछे उसका कोई न कोई उद्देश्य अवश्य निहित होता है ! अतः निहित उद्देश्यों की वजह से विशेष बीजाक्षर मन्त्र का प्रयोग किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही किसी विशेष व्यक्ति द्वारा ही प्रयोग किया जा सकता है ! इनका प्रयोग सर्वमान्य या सर्वप्रयोग्य नहीं है !
इसलिए हर किसी व्यक्ति को बीजाक्षर मंत्र का प्रयोग बिना सोचे समझे नहीं करना चाहिए ! बल्कि दूसरे शब्दों में कहा जाये कि बीजाक्षर मंत्र बहुत खतरनाक होता हैं, इसलिए इसका प्रयोग सदैव किसी गुरु या आचार्य की देखरेख में ही करना चाहिए अन्यथा बीजाक्षर मंत्र शरीर में ऊर्जा का असंतुलन पैदा कर देते हैं ! जिससे मनुष्य के जीवन का कष्ट बढ़ जाता है ! कभी कभी तो जीवन ही नष्ट हो जाता है !
बीजाक्षर मंत्रों से प्राकृतिक स्वर, नाद, ध्वनि का प्रयोग सर्वथा सर्वक्षेष्ठ, सर्वमान्य और सर्वसुलभ होने के साथ ही सर्वाधिक प्रभावशाली भी है ! इसीलिये बीजाक्षर मंत्रों की जगह अपने जीवन के संघर्षों को कम करने के लिये प्राकृतिक स्वर, नाद, ध्वनि का प्रयोग करना चाहिये !
जिसमें भी “ईश्नाद साधना” सर्वक्षेष्ठ है ! जिसे वैष्णव लोगों ने “देव वाणी साधना” कहा है और इसी को बाइबिल में “ग्लासोलालिया” कहा गया है अर्थात “परम आनन्द के स्वर” !
यह मनुष्य के “अंतरात्मा की आवाज” है, जो हर मनुष्य की अलग अलग होती है, इसमें विविधता है ! इसीलिये इसे सर्वक्षेष्ठ कहा गया है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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