वाराही तंत्र ग्रंथों में मारण तंत्र एक विशिष्ठ तंत्र प्रक्रिया है ! जिसका प्रयोग विश्व की सभी संस्कृतियों में अपने अपने तरह से सदियों से होता आ रहा है !
मारण तंत्र क्रिया की सिद्धि के सात चरण हैं ! प्रथम तीन चरणों में साधक स्वयं को तैय्यार करता है फिर दो चरणों में आत्म रक्षा का अभ्यास करता है ! और अंतिम दो चरणों में अल्प और पूर्ण मारण को सिद्ध करता है !
पूर्ण मारण सिद्ध किया व्यक्ति इस संसार में मनुष्य ही नहीं जीव जंतु पशु पक्षी वनस्पति किसी को भी मार सकता है !
लेकिन मेरे अनुभव में सर्वाधिक मारण का प्रयोग अल्प मारण का किया जाता है ! इसमें व्यक्ति मरता तो नहीं है पर उसका जीवन मृत्यु तुल्य हो जाता है !
इस क्रिया में मारक ग्रह को ऊर्जा बढ़ा दी जाती है ! वह मारक ग्रह जिस भाव में बैठा होता है उसी को नष्ट करने लगता है ! जैसे
किसी का मारक ग्रह पुत्र भाव में हो, तो मारण प्रयोग पर पुत्र का स्वास्थ्य ख़राब होने लगेगा, कोई दवा कार्य नहीं करेगी !
इसी तरह मारक ग्रह धन भाव में हो तो मारण प्रयोग पर धन नष्ट होने लगेगा जब तक मारण नहीं कटता कोई भी उसका धन नहीं बचा पायेगा !
इसी तरह मारक ग्रह पद प्रतिष्ठा के भाव में हो, तो मारण प्रयोग पर नौकरी चली जायेगी ! लाख प्रयास के बाद भी नहीं बच पायेगी जब तक मारण काटा नहीं जाता है !
यही अल्प मारण है इसमें व्यक्ति मरता नहीं है बल्कि उसे जीवन में घटी घटनाओं से मृत्यु तुल्य कष्ट लम्बे समय तक बना रहता है और व्यक्ति उसे में उलझ कर स्वयं को नष्ट कर लेता है !
यह मारण साधना सदैव किसी योग्य गुरु के सानिध्य में सीखना चाहिये ! इस साधना को सीखने के दौरान बहुत से आतंरिक और वाह्य कवच उर्जाओं का सहयोग लेना पड़ता है !
इसीलिये मारण तंत्र क्रिया को एक कठिन साधना कहा गया है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये
www.sanatangyanpeeth.in
