मात्र शैव ही जीवन चक्र के समस्त वर्तुल को समझ सकता है । क्योंकि उसके इष्ट शिव ही सृष्टि चक्र के सृजन, पालन और संहार चक्र को नियंत्रित करते हैं।
शिव ही ज्ञान और योग के अनादि स्रोत हैं । मात्र शिव ही समग्र को स्वीकारते हैं । इसीलिए उनके अनुयाई दैत्य, दानव, असुर, राक्षस सभी संस्कृति के लोग रहे हैं ।
इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्य योनियों को भी स्वीकार किया है ! भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्न, यक्ष, किन्नर, आदि सभी उनकी ऊर्जा से संचालित है ।
इसके अलावा जीव-जंतु, पशु-पक्षी, वनस्पति सभी में शिव अंश मौजूद है, इसलिए शिव समग्र के आराध्य हैं ।
अत: शैवों को भी किसी को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है ।
शैव जन्म भेद, जाति भेद, योनि भेद, स्थान भेद, समय भेद, कर्मकाण्ड भेद से ऊपर होता है । उसके लिए सब कुछ ईश्वर का ही बनाया हुआ है ! इसलिए वह किसी में भी भेदभाव को नहीं मानता है । यह एक महामानव के समग्र होने की पहचान है ।
शिव का न तो कोई आरंभ है और न ही कोई अंत है ! वह अनंत, अविनाशी, यत्र. तत्र. सर्वत्र मौजूद हैं। इसीलिए उन्हें अतरंगी देवता कहा गया है ।
उन्हें न देवालय में कोई दिक्कत है और न ही शमशान में, उन्हें न पहाड़ की चोटियों पर कोई परेशानी है, न समुद्र की गहराइयों में, उनके लिए नगर और वीरान सब एक जैसा ही है ।
इसलिए शिव का अनुगमन करने वाले शैवों के लिए भी हर स्थान और परिस्थिती एक जैसी ही है ।
इसीलिए शैव प्रकृति के निकट रहकर अपनी जीवनी ऊर्जा को विकसित कर लेते हैं । वह किसी भी व्यर्थ के आडंबर में नहीं फंसते हैं । इसीलिए शैव माया के प्रभाव में भी नहीं रहते हैं ।
इसीलिए मैं समझता हूं कि शैव ही सर्वश्रेष्ठ हैं ।।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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