इस विषय को एक उदाहरण से समझाता हूँ !
एक व्यक्ति के पास उसे अति प्राचीन एक पांडुलिपि मिली ! उस व्यक्ति ने जब उस पांडुलिपि का गहराई से अध्ययन किया तो उसे पता चला कि उसमें सोना बनाने का फार्मूला लिखा हुआ है !
उसने उस फार्मूले से सोने का निर्माण किया और वह सफल हुआ ! अब उसके मन में यह इच्छा हुई कि मैं यह विद्या बहुत लोगों को सिखा दूं ! किंतु लोगों ने उससे विद्या को सीखने की जगह उस व्यक्ति को मात्र उससे पर्याप्त सोना प्राप्त करने की इच्छा से अनावश्यक बहुत महत्व देना शुरू कर दिया !
कालांतर में आयु पूरा होने पर उसे व्यक्ति की मृत्यु हो गई और वह सोना बनाने की विद्या पुन: विलुप्त हो गई !
ठीक यही स्थिती शैव ग्राम के संदर्भ में है !
मैं यह चाहता हूं कि मैं भगवान शिव द्वारा बतलाई गई “शैव तंत्र विद्या” को अधिक से अधिक सुपात्र लोगों तक पहुंचा दूँ ! लेकिन लोगों की रुचि उस विद्या को सीखने से ज्यादा मुझे महत्व देने में बनी हुई है !
इस हेतु वह “शैव जीवन शैली की तंत्र विद्या” कहीं कालांतर में कलयुग के प्रभाव में मेरे साथ ही पुनः विलुप्त न हो जाये ! यह विचार प्राय: मेरे मस्तिष्क में निरंतर चलता रहता है !!
विशेष :-
अत: स्पष्ट है शैव ग्राम को यदि दीर्घ आयु बनाना है, तो मुझे महत्व देने से नहीं बनेगा बल्कि भगवान शिव द्वारा बतलाई गई, “शैव जीवन शैली के तंत्र विधान” का अनुगमन करना होगा ! तभी शैव ग्राम दीर्घ आयु होगा !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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