शैव ही मानवता के वास्तविक रक्षक कैसे हैं

पूरे विश्व में एक मात्र शैव जीवन शैली ही है, जो संपूर्ण विश्व में मानवता की रक्षा कर सकती है, अन्यथा अन्य जीवन शैलियां तो मनुष्य का सर्वनाश कर ही रही हैं !

दूसरे शब्दों में मात्र शैव जीवन शैली ही त्याग, सहजता और पारदर्शिता पर आधारित है और मानवता की रक्षा का सूत्रइन्हीं तीन शब्दों में छिपा है !

जब तक मनुष्य त्याग, सहजता और पारदर्शिता के महत्व को ठीक से नहीं समझेगा ! तब तक किसी भी पद्धति से मानवता की रक्षा नहीं हो सकती है !

इसलिए मानवता की रक्षा के लिएइन तीन शब्दों को विस्तार से समझना होगा !

सबसे पहले हम त्याग शब्द पर चर्चा करते हैं !

त्याग का तात्पर्य “मानसिक त्याग” से है ! दुनिया को दिखाने के लिए जो त्याग किया जाता है, वह व्यक्ति का आडंबर है !

और आज बड़े-बड़े साधु संत इसी त्याग के आडंबर में फंसे हुए हैं ! जिसे देखकर समाज का बहुत बड़ा वर्ग उन्हें त्यागी पुरुष मानता है लेकिन वास्तव में वह लोग समाज के लिए एक बड़ी समस्या हैं !

मानसिक त्याग से तात्पर्य किसी भी वस्तु को या विचार को मोह वर्ष अपने पास न रखना है ! वस्तु और विचार का संग्रह मात्रा उपयोगिता के लिए होना चाहिए यदि कोई वस्तु या विचार हमारी उपयोगिता से अधिक है तो हमें उसेकिसी अन्य को भेंट कर देना चाहिए !

लेकिन आज बड़े-बड़े साधु संत बड़े-बड़े आश्रम, गाड़ी, नौकर, संसाधन मात्रा अपनी विलासिता के लिए प्रयोग कर रहे हैं, जबकि उनके बिना भी एक अच्छे संत के रूप में जीवन यापन किया जा सकता है !

और जो वह याद कदा दान कर देते हैं, वह मात्र अपने त्यागी आडंबर को पुष्ट करने के लिए करते हैं, जो उनके द्वारा समाज को दिया गया एक गलत संदेश है !

इसी तरह हम “सहजता” को समझते हैं !

सहजता माया के विपरीत शब्द है, अर्थात यदि माया से मुक्त होना है, तो आपको सहजता अपनाना होगा और जो व्यक्ति अपने जीवन को सहज नहीं बन पाता है, वह माया के प्रभाव में फंसा ही रहता है !

अर्थात मोक्ष की तरफ उठाया गया पहला कदम “सहजता” है जो व्यक्ति सहज नहीं है, वह जीवन भर पुरुषार्थ करने के बाद भी मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता है !

सहजता परम पुरुषार्थ का विषय है, इसे सामान्य मनुष्य सामान्य चिंतन से प्राप्त नहीं कर सकता है, इसीलिए विद्वानों ने कहा है कि इस माया क्षेत्र में सांसारिक होते हुए भी मनुष्य के लिये सहज होना असंभव है !

किन्तु साधकों के लिए इसी माया क्षेत्र में सहजता एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे किसी भी तत्व ज्ञानी के मार्गदर्शन में सीखा समझा और अपनाया जा सकता है !

सहज व्यक्ति का कोई भी प्रतिस्पर्धी नहीं होता है, उसके सब अपने मित्र ही होते हैं, वह अपनी ओर से किसी से शत्रुता नहीं मानता है, इसीलिए प्रकृति भी उसका साथ देती है !

आईये अब तीसरी विषय “पारदर्शिता” पर चिंतन करते हैं !

पारदर्शिता मानसिक विकृतियों के विनाश की तरफ उठाया गया पहला कदम है, जो व्यक्ति जितना अधिक पारदर्शी होगा, उसके मानसिक विकार उतनी तेजी से समाप्त होंगे !

क्योंकि हमारे मानसिक विकारों को हमें समाज बतलाता रहता है और हम अपने व्यक्तित्व में जब प्रदर्शित को छोड़कर समाज से मानसिक विकारों को छिपा लेते हैं ! तब हमें पूरे जीवन यह पता नहीं चलता है कि हम किस-किस मानसिक विकास से फंसे हुए हैं !

यदि व्यक्ति अपने अहम् पर होने वाली चोट से उत्पन्न मानसिक पीड़ा के भय को त्याग कर पारदर्शिता के सिद्धांत को अपना ले, तो यह प्रकृति समाज अर्थात माया के माध्यम से प्रतिक्षण आपका शोध करती रहती है !

और आप पारदर्शिता को अपना कर नित्य अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त करते रहते हैं !

यह तीनों ही गुण जब किसी व्यक्ति में विकसित हो जाते हैं, तो वह व्यक्ति मानवता के लिए वरदान हो जाता है, और ऐसे व्यक्ति ही मानवता को सही दिशा दिखा कर मानवता की रक्षा कर सकते हैं !

यह तीनों गुण शैव जीवन शैली का अनुगमन करने वाले साधकों में सहज ही पाए जाते हैं, इसलिए “शैवी ही मानवता के वास्तविक रक्षक हैं !!”

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

और अधिक जानकारी के लिये पढ़िये

www.sanatangyanpeeth.in

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2491

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *