वैष्णव जीवन शैली में यह अवधारणा है कि यदि कोई व्यक्ति अपने भाग्य के दुखद क्षणों को बदलना चाहता है, तो उसे भगवान की भक्ति करनी चाहिए !
क्योंकि भगवान ही किसी व्यक्ति के भाग्य को बदल सकते हैं ! अन्य किसी में यह समर्थ नहीं है !
इसी दर्शन की मार्केटिंग सभी वैष्णव ग्रंथ और कथावाचक अनादि काल से करते आ रहे हैं !
इसके लिए वह बहुत सारी कपल कल्पित कहानियां भी सुनते हैं !
फिर वह चाहे गज और ग्राह की कहानी हो या सावित्री सत्यवान की कथा !
लेकिन शैव जीवन दर्शन में भाग्य परिवर्तन के सिद्धांत एकदम अलग हैं ! शैव जीवन दर्शन के अनुसार किसी भी व्यक्ति का भाग्य कोई भगवान नहीं बदल सकता है !
बल्कि भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को वह समर्थ दिया है कि वह अपना भाग्य स्वयं बदल सकता है !
बस इसके लिए व्यक्ति को अपने जीवन में कष्ट देने वाले उन वृत्तियों को ढूंढ कर निकलना होगा ! जिसके कारण उसके जीवन में कष्ट है !
व्यक्ति अपनी वृत्ति को बदलेगा, उसका भाग्य स्वत: बदल जाएगा और यदि व्यक्ति अपनी वृत्तियों को नहीं बदलता है, तो उसका भाग्य कोई भगवान नहीं बदल सकता है !
हमारे इतिहास में न जाने कितने भक्त हुए, जिन्होंने अपना अन्नय जीवन भगवान की भक्ति में गुजार दिया, किंतु उनके जीवन का संघर्ष खत्म नहीं हुआ ! इसके सैकड़ो उदाहरण हमारे शास्त्रों में मौजूद हैं !
और व्यवहारिक जीवन में भी ऐसा ही दिखाई देता है !
इसलिए अपने भाग्य को बदलने के लिए किसी भगवान के भरोसे मत बैठिए, बल्कि अपने जीवन में भाग्य के अवरोध को उत्पन्न करने वाले वृत्तियों को पहचानिए और उन्हें दूर करने का प्रयास कीजिए !
आप कष्टकारी वृत्तियों से जितना दूर होंगे, आपके भाग्य का संघर्ष उतना दूर कम होता जाएगा !
यही प्रकृति की स्पष्ट व्यवस्था है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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