आज के आध्यात्मिक समाज में वैष्णव द्वारा लम्बे समय से एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है कि वास्तविक भक्त की पहचान ही गरीबी है !
यह है “गरीबी का निरर्थक महिमामंडन”।
हमें बचपन से सिखाया जाता है कि “पैसा हाथ का मैल है” या “संतों को धन से क्या काम?”। लेकिन सत्य यह है कि कलयुग में ‘अर्थ’ (धन) के बिना ‘धर्म’ भी पंगु है।
सनातन धर्म ने कभी भी दरिद्रता का समर्थक नहीं किया है, बल्कि दरिद्रता को एक अभिशाप, एक दण्ड माना है।
हमारे ऋषियों ने जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ध्यान दीजिये, यहाँ ‘धर्म’ के तुरंत बाद ‘अर्थ’ (धन) को स्थान दिया गया है। इसका सीधा तर्क है कि एक भूखा व्यक्ति न तो भजन कर सकता है और न ही ईमानदारी से राष्ट्र की रक्षा ही कर सकता है।
महाभारत में भीष्म पितामह ने स्पष्ट किया है, कि “धनात् धर्मः ततः सुखम्”, अर्थात धन से ही धर्म का पालन होता है, उसी से सुख की उत्पत्ति होती है।
जरा विचार करें, यदि धन इतना ही बुरा होता, तो भगवान विष्णु की पत्नी ‘लक्ष्मी’ धन की देवी क्यों होती ! स्वयं महादेव, जो श्मशान वासी और परम वैरागी हैं, उन्होंने भी ‘कुबेर’ (धन के देवता) को अपना खजांची क्यों बनाया?
इससे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिकता का अर्थ “कंगाल या दरिद्र” होना नहीं है, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण रखकर उनका सदुपयोग करना है, न कि अहंकार के लिये उसका दुरुपयोग करना है !
पैसा केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक ब्रह्माण्डीय ‘ऊर्जा’ का प्रगट सांसारिक स्वरूप है। जब यह ऊर्जा सही हाथों में होती है, तो यह विद्यालय, चिकित्सालय और मंदिर बनाती है। लेकिन जब यही ऊर्जा गलत हाथों में जाती है, तो विनाश करती है। इसलिए, एक सात्विक और सनातनी व्यक्ति का “अमीर” होना अत्यंत आवश्यक है।
अपनी गरीबी को त्याग कर संतोष और त्याग का नाम रटना बंद करें। धन कमाना कोई पाप नहीं, बल्कि यह एक सांसारिक कर्तव्य है। यदि आप अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र को सशक्त देखना चाहते हैं, तो पहले आपको “आर्थिक रूप से सशक्त” करना पड़ेगा।
दरिद्रता एक अभिशाप है, इसका त्याग करें और ‘अर्थ भैरव’ (समृद्धि) का वरण करें। यही हमारा सभी को सन्देश है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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