शोध – 3
यह गुफा हिमालय के एक अत्यंत निर्जन गुप्त स्थान पर है, जहाँ एक दिव्य सन्त रहते हैं, भगवान शिव की कृपा से मुझे उनके दर्शन करने और आशीर्वाद लेने का अवसर मिला ! उनकी मेरे बारे कही गयी एक एक बात सच साबित हुई ! मेरा सर्वप्रथम उन त्रिकाल दर्शी सन्त को प्रणाम !
अब प्रश्न यह उठता है कि इस स्तर के उच्च कोटि के दिव्य संत समाज की चकाचौंध से दूर, बीहड़ गुफाओं में अज्ञात अवस्था में क्यों रहते हैं? वस्तुतः, यह संसार से छिपना या पलायन नहीं है, बल्कि स्वयं की अनंत गहराइयों में उतरने की एक सचेत और अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, समाज में रहने से मानव मस्तिष्क लगातार बाहरी उत्तेजनाओं और सामाजिक अपेक्षाओं से घिरा रहता है। जिससे वह निरंतर ईश्वरीय ऊर्जा से दूर होता चला जाता है ! गुफाएं प्राकृतिक रूप से एक ‘सेंसरी डेप्रिवेशन चैंबर’ का काम करती हैं। बाहरी शोर और कृत्रिम जीवन संतों की मानवीय अंतःक्रियाओं को क्षति पहुंचती हैं।
जबकि एक सघन एकांत में संत ईश्वरीय ऊर्जा से जुड़ कर अपने अवचेतन और अचेतन मन में त्रिकाल सामर्थ प्राप्त कर लेते हैं, उसके बाद उनके लिये इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं होता है !
वह काल से जुड़कर निर्भयता का सानिध्य प्राप्त कर लेते हैं। यह प्रक्रिया उन्हें विशुद्ध आत्म-बोध और ईश्वरीय मनोवैज्ञानिक पूर्णता तक ले जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, गुफाएं पृथ्वी के गर्भ का प्रतीक है, जो शांत, स्थिर और मौलिक ऊर्जा से परिपूर्ण होती है। जबकि समाज की सामूहिक मानसिक उथल-पुथल के बीच आध्यात्मिक ऊर्जा (ओजस और तेज) का क्षरण होता है।
गुफा का मौन संतों को अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार कराने में सहायक होती है! यहाँ ‘तप’ का अचूक वातावरण होता है। यहाँ वह माया के विक्षेपों से मुक्त होकर अपनी प्राण-ऊर्जा को पूरी तरह ऊर्ध्वगामी बना पाते हैं।
संतों का गुफा चेतना की वह ब्रह्मांडीय प्रयोगशाला है, जहाँ भौतिक अस्तित्व की सबसे गहरी खाइयों में योगबल से उतरकर आत्म-ज्ञान के उच्चतम शिखर को प्राप्त किया जा सकता है।
इसलिये दिव्य सन्त दुनिया से अलग एकांत में रहते हैं, जिससे वह संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर अनुभव से समझ कर माया के जाल से सदैव के लिये मुक्त हो सकें।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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