ईश्वर की प्रार्थना अक्सर एकांत, मौन और शांति से जुड़ी गहन प्रक्रिया है। लेकिन जब हम किसी अत्यंत अभावग्रस्त या दरिद्र व्यक्ति को ईश्वर की प्रार्थना करते देखते हैं तो उसे प्राय: चीख-चीख कर या रोते हुए भगवान को पुकारते देखते हैं, यह दृश्य केवल एक धार्मिक आस्था नहीं है।
बल्कि यह चीख चरम मानसिक दबाव, असहायता और मानवीय पीड़ा का एक गहरा प्रकटीकरण है। मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए, तो यह आर्तनाद (दर्द भरी पुकार) दरिद्र मनुष्य के मस्तिष्क की एक स्वाभाविक और जटिल स्थिती का प्रगटीकरण है।
लंबे समय तक गरीबी, भूख, सामाजिक अन्याय और असहायता केवल शरीर को ही नहीं तोड़ते, बल्कि मनुष्य की आत्मा और मानस पर भी गहरे घाव बना देते हैं। जब कोई व्यक्ति लगातार इन अमानवीय और विवशताओं का सामना करता है, तो उसके अवचेतन मन में हताशा, क्रोध और पीड़ा का एक विशाल पहाड़ खड़ा हो जाता है।
यह समाजिक उपेक्षा उसे अंदर ही अंदर एक भयानक घुटन और तनाव में बदल देती है।
मनोविज्ञान में, इस दबी हुई और पीड़ादायक भावनाओं के तीव्र विस्फोट को ‘कैथार्सिस’ कहता है, यानी नकारात्मक भाव-विरेचन प्रक्रिया।
तेज़ आवाज़ में रोना, चीखना या अपनी यातना को आसमान की ओर पुकारना यह मन के भीतर बन रहे उस जानलेवा मनोवैज्ञानिक दबाव का परिणाम है, जो व्यक्ति के हताश होने की सूचना है।
यदि यह संचित नकारात्मक ऊर्जा चीख चिल्ला कर बाहर न निकले, तो यह मन को भीतर से खोखला कर सकती है, जिससे व्यक्ति का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है और वह गंभीर अवसाद या साइकोसिस का शिकार हो सकता है।
इसी गुप्त अदृश्य आतंरिक आघात से बचने के लिये दरिद्र व्यक्ति चीख चीख कर भगवान को भजन कीर्तन के बहाने पुकारता है !
यह एक धार्मिक चिकित्सा पध्यति है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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