यह कथन एक शाश्वत सत्य है कि आधुनिक विश्वविद्यालयों से हमें केवल ‘सूचना’, डिग्रियां और आजीविका कमाने का कौशल मिलता है।
लेकिन वास्तविक ‘ज्ञान’, आत्मबोध और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों की समझ जो एकांत, मौन और गहन चिंतन से ही उपजती है। वह प्रकृति के निकट शान्त ‘कंदराओं’ में मिलता है, जहाँ मनुष्य दुनिया के शोर से दूर स्वयं से और प्रकृति से सीधा संवाद कर पाता है।
इतिहास गवाह है कि हमारे महान विचारकों ने अपना सर्वोच्च ज्ञान पुस्तकालयों की भीड़ में नहीं, बल्कि एकांत में प्राप्त किया था।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो, राजकुमार सिद्धार्थ को जीवन का परम सत्य राजमहलों या विद्वानों की सभाओं में नहीं मिला। उन्होंने जंगलों में घोर तपस्या की, तब जाकर बोधगया के एकांत में उन्हें ज्ञान मिला तब वह ‘गौतम बुद्ध’ बन पाये।
भगवान महावीर ने भी 12 वर्षों तक एकांत में कठोर तप किया। तब वह राजकुमार से महावीर बन पाये !
हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने हिमालय की शांत कंदराओं में ही वेदों और उपनिषदों के उस असीम ज्ञान का सृजन किया, जिस पर आज दुनिया भर के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय शोध कर रहे हैं।
विदेशी महापुरुषों के जीवन में भी यही सच्चाई दिखाई देती है। इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद को सत्य का ईश्वरीय ज्ञान मक्का की भीड़ में नहीं, बल्कि ‘हिरा की गुफा’ के गहन एकांत में प्राप्त हुआ था।
इसी तरह, ईसाई धर्म के प्रवर्तक प्रभु यीशु (जीसस क्राइस्ट) ने अपनी आध्यात्मिक यात्रा और उपदेश शुरू करने से पहले जूडिया के रेगिस्तान में उन्होंने 40 दिन और 40 रातें घोर एकांत तप किया था। उस निर्जन स्थान पर उपवास और ध्यान करते हुए ही उन्होंने आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त की थी। वह वीरान रेगिस्तान ही उनके लिए एक शांत कंदरा थी।
ज्ञान का यह नियम केवल अध्यात्म तक सीमित नहीं है, बल्कि विज्ञान पर भी पूरी तरह लागू होता है। सर आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और कैलकुलस का सिद्धांत कैंब्रिज विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं, बल्कि प्लेग महामारी के दौरान अपने गाँव के घर के लंबे एकांत में खोजा था।
महान आविष्कारक निकोला टेस्ला ने भी कहा था, *”एकांत में मन अधिक कुशाग्र होता है। उन्होंने अकेले रहकर ही अनेकों आविष्कारों और गुण रहस्यों को जन्म दिया।”
महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी सापेक्षता का सिद्धांत किसी विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि पेटेंट ऑफिस की शांति एकांत अध्ययन कक्ष में अपने मन की कंदरा में डूब कर प्राप्त किया था।
विश्वविद्यालय हमें संसार की व्यवस्था को समझने की दृष्टि देते हैं, लेकिन स्वयं को और इस सृष्टि के मूल को समझने के लिए मनुष्य को अपने भीतर की कंदरा (ध्यान और एकांत) में उतरना ही पड़ता है। आज का युवा यही गलती कर रहा है, इसीलिये वह भटक रहा है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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