जैन ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, यह लोक (ब्रह्मांड) छह शाश्वत द्रव्यों से मिलकर बना है: जीव (चेतना), पुद्गल (पदार्थ), धर्म (गति का माध्यम), अधर्म (विश्राम का माध्यम), आकाश (स्थान) और काल (समय)।
जैन दर्शन का स्पष्ट नियम है कि किसी भी सत् (अस्तित्व) का कभी पूर्ण विनाश नहीं हो सकता और असत् (शून्य) से कभी कुछ उत्पन्न नहीं हो सकता।
इसीलिये 9वीं शताब्दी के महान जैन आचार्य जिनसेन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘महापुराण’ में ईश्वर के सृष्टिकर्ता होने का अत्यंत प्रखर तार्किक खंडन किया है। वह लिखते हैं कि:
कुछ अज्ञानी मनुष्य कहते हैं कि एक सृष्टिकर्ता ने दुनिया बनाई है। सृष्टि निर्माण का यह सिद्धांत विचारहीन है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।
इसके पीछे आचार्य जिनसेन अकाट्य तर्क देते हैं कि
यदि ईश्वर ने दुनिया बनाई है, तो सृष्टि निर्माण से पहले वह ईश्वर कहाँ रहता था?
यदि ईश्वर पूर्णकाम (जिसकी कोई इच्छा शेष न हो) और वीतरागी है, तो उसे ब्रह्मांड बनाने की इच्छा क्यों हुई? इच्छा का होना ही अपूर्णता का प्रतीक है।
यदि ईश्वर परम-दयालु है, तो उसकी बनाई इस दुनिया में इतनी क्रूरता, रोग, परभक्षण और दुख क्यों है?
जैन धर्म में जगत के संचालन का श्रेय ‘ईश्वर’ को नहीं, बल्कि ‘कर्म सिद्धांत’ और द्रव्यों के प्राकृतिक ‘स्वभाव’ को जाता है। विश्व में जो भी निरंतर परिवर्तन हो रहे हैं, इस दुनियां में जो घटा रहा है, वह प्राकृतिक नियमों और जीवों के अपने कर्मों का फल है। किसी ईश्वर का इसमें हस्तक्षेप नहीं है !
अर्थात जैन धर्म नास्तिक दर्शन नहीं है फिर भी यह आत्मा की ही सर्वोच्च, शुद्ध और पूर्ण ज्ञान वाली अवस्था (सिद्ध या अरिहंत) को ‘ईश्वर’ मानता है।
किन्तु वह उस ईश्वर को सृष्टि का रचयिता, पालक या विनाशक नहीं मानता। ब्रह्मांड किसी की रचना नहीं, बल्कि एक स्व-संचालित, अनादि और अनंत सत्य प्रवाह है।
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