(शोध लेख)
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी चुनाव प्रणाली है, जहाँ वैसे तो तथाकथित तौर पर प्रत्यक्ष रूप से संविधान और तार्किकता को सर्वोच्च माना जाता है। लेकिन सत्ता के गलियारों का एक गहरा, अदृश्य और मनोवैज्ञानिक सच भी है, आज सत्ता में बैठे हुये लोग आस्था और ‘गुह्य तंत्र विद्याओं के समर्थ’ से सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
वर्तमान में केंद्र और अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के विशाल सांगठनिक ढांचे को देखते हुए यह विमर्श अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि आधुनिक राजनीति अब क्या तार्किक रणनीतियों की जगह तांत्रिकों के भरोसे चलेगी?
वर्तमान परिदृश्य में, सत्तारूढ़ दल के पास संसद (लोकसभा और राज्यसभा) में लगभग 340 के करीब सांसद और देशभर की विधानसभाओं व विधान परिषदों में 1,800 से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि बैठे हैं। केंद्र और 21 राज्यों को मिलाकर सैकड़ों मंत्री सत्ता का संचालन कर रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक लाखों सक्रिय पदाधिकारी काम कर रहे हैं। सत्ता का यह व्यापक स्वरूप और वर्चस्व स्वाभाविक रूप से तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आंतरिक गुटबाजी, कानूनी उलझनों और अपनी कुर्सी छिनने का एक सतत भय उत्पन्न करता है।
इसी मनोवैज्ञानिक असुरक्षा, डगमगाते आत्मविश्वास और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने की अंधी होड़ में, कई राजनेता सामान्य पूजा-पाठ को छोड़कर अपने तांत्रिक गुरुओं के माध्यम से उग्र तांत्रिक साधनाओं की शरण में हैं।
चुनावी समर हो, मंत्रिमंडल का विस्तार हो, या कोई बड़ा राजनीतिक संकट हो तो तत्काल इन जनप्रतिनिधियों का रुख तुरंत उन प्राचीन शक्तिपीठों की ओर हो जाता है, जिन्हें वाममार्गी और तांत्रिक शक्तियों का केंद्र माना जाता है।
फिर वह चाहे मध्य प्रदेश का पीतांबरा पीठ जिसमें श्मशान-समीपस्थ बगलामुखी मंदिर हो या असम का कामाख्या पीठ या फिर पश्चिम बंगाल का तारापीठ हो ! आज यह सब तंत्र पीठ अघोषित रूप से राजनेताओं के ‘पॉलिटिकल पॉवर सेंटर’ बन चुके हैं।
इन तांत्रिक केंद्रों पर सत्ता प्राप्ति और विरोधियों के पूर्ण शमन के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इनमें ‘शत्रु नाशक महायज्ञ’, ‘सुपारी संकल्प’ और दस महाविद्याओं के ‘स्तम्भन, मारण, मोहन, वाशीकरण आदि अनुष्ठान प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त, ‘कौल तंत्र’ के अंतर्गत पशु बलि और मध्यरात्रि में श्मशान घाटों पर वाममार्गी अघोर साधनाएं भी सत्ता के एकाधिकार को स्थायी बनाने के लिए गुप्त रूप से संपन्न करवाई जाती हैं।
राजनीति में तंत्र शास्त्र के ‘षट्कर्म’—विशेषकर ‘वशीकरण’ (वोटरों या आलाकमान को अपने अनुकूल करना) और ‘उच्चाटन’ (विरोधियों का मानसिक संतुलन बिगाड़कर उन्हें सत्ता से बेदखल करना)—का प्रयोग एक परिष्कृत तंत्रोक्त हथियार बन चुका है।
यह स्थिती स्पष्ट करती है कि राजनीतिक व्यवस्था में इन तांत्रिकों की इतनी गहरी और चिंताजनक पैठ बना ली है और जनादेश न होने के बाद भी आज तंत्र सत्ता में काविज रहने का घातक हथियार है, जो लोकतंत्र के उद्देश्य को विफल करता है !
यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि संपूर्ण राजनीतिक ढांचा केवल तांत्रिकों के भरोसे चल रहा है; चुनाव जीतने के लिए संगठन, जनसंपर्क और राजनीतिक कौशल आज भी प्राथमिक आवश्यकताएं हैं।
लेकिन यह भी एक अकाट्य यथार्थ है कि राजनेताओं का एक बड़ा वर्ग विकास, विज्ञान और आधुनिकता की सार्वजनिक बातें करने के बावजूद, अपने निजी राजनीतिक संकटों के निवारण के लिए पूरी तरह से गुह्य तंत्र विद्याओं पर निर्भर है।
जब तक राजनीति में अत्यधिक अनिश्चितता और सत्ता खोने का खौफ रहेगा, तब तक आधुनिक लोकतंत्र में भी सत्ता का मार्ग इन तांत्रिकों के गलियारों और शक्तिपीठों से ही होकर गुजरेगा।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553
