एपस्टीन ने कुछ भी नया नहीं किया, अनादि काल से राजाओं और लोकतंत्र के उदय के बाद आज के जमाने के राजा अर्थात नेताओं/अरबपतियों को नियंत्रित करना बच्चों का खेल नहीं है।
समकालीन सत्ताओं को अपनी मुट्ठी में रखने के लिए भगवान कृष्ण और एपस्टीन ने “मनोवैज्ञानिक नियंत्रण” की 4 एक जैसी रणनीतियां अपनाईं हैं। दोनों के तरीके दृष्टि और उद्देश्य अलग अलग हैं, लेकिन कूटनीति की दृष्टि से दोनों में काफी समानता है !
फर्क सिर्फ यह है कि कृष्ण ने “एहसान” और “प्रेम” में तत्कालीन राजाओं को बांधा, वही दूसरी तरफ एपस्टीन ने “डर” “लालच” और “सेक्स” से नियंत्रित करने का प्रयास किया।
यहाँ मैं कृष्ण और एपस्टीन की 4 नीतियों का विश्लेषण कर रहा हूँ !
पहली नीति ‘ऋणानुबंध’ की नीति
राजनीति का नियम है— ‘जिस राजा पर तुम्हारा कर्ज है, वह तुम्हारे नियंत्रण में रहेगा।’
कृष्ण ने इस सिद्धान्त का कहाँ उपयोग किया !
जरासंध ने 20,000 राजाओं को कैद कर रखा था और वह उनकी बलि देने वाला था। कृष्ण ने भीम के हाथों जरासंध को मरवा कर, उन 20,000 राजाओं को आजाद करवाया।
यह वह 20,000 राजा थे, जो जीवन भर के लिए कृष्ण के ऋणी हो गये और जब महाभारत युद्ध हुआ, तो यह राजा पांडवों के पक्ष में लड़े। कृष्ण ने ‘प्राण दान’ देकर इन राजाओं को नैतिक रूप से खरीद लिया था।
इसी तरह एपस्टीन ने बड़े लोगों को ‘सुख’ (नाबालिग लड़कियां/अय्याशी) देकर, जो उन्हें कहीं और नहीं मिल सकता था। उन्हें अपने नियंत्रण में कर लिया ! जिसका लाभ वह आजीवन उठता रहा ! जबकि यह एक ‘गुप्त पाप’ का कर्ज था।
दूसरा. भेद की नीति
अनादि काल से राजाओं को तलवार से नहीं, उनकी ‘कमजोरी’ पकड़कर नियंत्रित किया जाता है।
कृष्ण भी हर राजा का भूत-भविष्य जानते थे।
वह जानते थे कि धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में अंधे हैं, धृतराष्ट्र के लिये दुर्योधन भावनात्मक कमजोरी है।
वह जानते थे कि कर्ण अपनी पहचान को लेकर कुंठित है, यह उसकी सामाजिक कमजोरी है। जिसे छिपाने और अपनी छवि सुधारने के लिये वह दान देता है !
कृष्ण ने इन कमजोरियों का इस्तेमाल किया और सही समय पर ‘निर्णय बदलने’ इन सूचनाओं को प्रयोग किया। जैसे इंद्र को कर्ण और कुंती का सच बताकर उसका कवच कुण्डल मांग लेना। आदि
इसी तरह एपस्टीन के हर कमरे में खुफिया कैमरे लगे थे। जिससे वह इन कलयुग के राजाओं और प्रधानमंत्रियों के ‘गंदे काम’ रिकॉर्ड कर लेता था। और फिर इन्हें ब्लेकमेल करता था !
तीसरी कृष्ण की आर्थिक सम्पन्नता नीति
कृष्ण की द्वारका भारत के पश्चिमी तट पर थी। उस समय का सारा व्यापार समुद्री मार्ग द्वारका से होकर गुजरता था। यह ही द्वारका की सम्पत्ति और अमीर का राज था। इस तरह भारतीय राजाओं और व्यापारियों की सम्पन्नता कृष्ण की कृपा पर निर्भर थी !
जब युधिष्ठिर को हस्तानापुर के महल निर्माण और राजसूय यज्ञ करने के लिए आर्थिक मदद चाहिए थी। तब कृष्ण पर आर्थिक रूप से आश्रित राजाओं ने कृष्ण के निर्देश पर पाण्डव की खुल कर मदद की !
इसी तरह एपस्टीन ने खुद को “अरबपतियों का बैंकर” बना लिया था। वह विक्टोरिया सीक्रेट के मालिक लेस्ली वेक्सनर जैसे लोगों का पैसा मैनेज करता था।
वह अमीरों का टैक्स बचाता था और उनका काला धन इधर-उधर करता था। अगर वह एपस्टीन को छोड़ते, तो उनका पैसा डूब जाता या फंस जाता। यह एपस्टीन की अथाह सम्पत्ति का रहस्य था !
चौथी मध्यस्थ नीति , दो लड़ते हुए राजाओं के बीच ‘बिचौलिया’ बन जाओ, तो दोनों तुम्हें अपना सगा मानेंगे।
कृष्ण ने अपने जीवन में अनेकों जगह शांतिदूत बनकर अनेकों राजाओं के झगड़े सुलझाये थे।
जब भी कोई संकट में आता था, तो सब कृष्ण की ओर देखते थे। “जो कृष्ण कहेंगे, वही होगा।” यह उस युग की सच्चाई थी !
एपस्टीन भी अपने समय का सबसे बड़ा पावर ब्रोकर था ! निर्णय लेता था कि किस वैज्ञानिक योजना को आगे बढ़ाना है किसे रोक देना है, वह नेताओं और हॉलीवुड स्टार्स का भविष्य तैय करता था।
अगर किसी वैज्ञानिक को फंड चाहिए, तो उसे एपस्टीन के जरिए बिल गेट्स से मिलना पड़ता था। एपस्टीन के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता था ! हिस्सेदारी देनी पड़ती थी, तब फंड मिलता था !
दोनों ने ही अपने समय के राजाओं को “कठपुतली” की तरह नचाया। लेकिन फिर भी कृष्ण युग पुरुष हैं और एपस्टीन ब्लेकमेलर और दरिंदा था ! लेकिन दोनों के ही दरबार में तत्कालीन राजा अपने भविष्य निर्माण के लिये हजारी लगाते थे ! दोनों ही अपने समय के निर्णायक और सत्ता का केंद्र थे !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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