दुनियां में झूठ न होता, तो मैं मर जाता !!
झूठ जीवन की बहुत बड़ी जरुरत है, उम्मीद झूठ के गर्भ से पनपती है ! जो व्यक्ति को जीने की उम्मीद देती है ! कल सब ठीक हो जायेगा, यह विचार झूठ से उपजी सांत्वना है, जो न जाने कितने लोगों को मौत के मुहं से बचा लेती है !
झूठ पहली नज़र में भले ही नैतिक रूप से अटपटा लगे, लेकिन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत गहरी और गंभीर सांत्वना है जो कई जिन्दगी को बर्बाद होने से बचा लेती है !
मानव जीवन स्वाभाविक रूप से अनिश्चितताओं, दुखों और अंततः मृत्यु की ओर अग्रसर है। अगर हम हर पल जीवन की इस नग्न, कठोर और अर्थहीन सच्चाई के प्रति पूरी तरह सचेत रहें, तो हमारा मस्तिष्क उस भय और निराशा को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
हम जीवित रहने के लिए प्रति क्षण खुद से कई बार ‘झूठ’ बोलते हैं “कि कल सब कुछ ठीक हो जायेगा। यह ‘झूठ’ या ‘भ्रम’ हमारी चेतना के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है।
पूर्ण और निरपेक्ष सत्य अक्सर बहुत तीखा और विनाशकारी होता है। अगर समाज में हर व्यक्ति हर समय केवल सच बोलने लगे, अपने हर छिपे हुए विचार, ईर्ष्या और कटु भावना को बिना किसी आवरण के व्यक्त करने लगे, तो सारे रिश्ते और सामाजिक संरचनाएं कुछ ही दिनों में ढह जाएंगी। सामाजिक शिष्टाचार, सांत्वना और ‘सफ़ेद झूठ’ वह गोंद हैं जो समाज और परिवार दोनों को बांधे रखती है।
यह लेख किसी अपराध का स्वीकार नहीं है, बल्कि मानवीय स्वभाव की एक गहरी दार्शनिक और परिपक्व समझ है। पूर्ण सत्य सूर्य की उस तेज रोशनी की तरह है जो आंखों को अंधा कर सकती है; वहीं झूठ उस छाते की तरह है, जो हमें उस झुलसाने वाली सत्य की धूप से बचाकर जीवन की कठिन यात्रा को पूरा करने में मदद करती है।
जीवन को सहनीय बनाने के लिए सत्य की कड़वाहट और झूठ की मिठास के बीच संतुलन बहुत जरुरी है।!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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