किसी भी सामाजिक या वैचारिक संगठन के लिए उसके विरोधी या शत्रु अनजाने में ही उसकी कीर्ति और यश को बढ़ाने में बहुत बड़े सहायक होते हैं। शत्रुओं द्वारा विरोध की रणनीति, मानव मनोविज्ञान और सामाजिक दर्शन के दृष्टिकोण से देखें तो, विरोध ही संस्थान के विकास और परिपक्व मानसिकता का सबसे बड़ा उत्प्रेरक है।
विरोधी जब किसी संगठन की निरंतर आलोचना करते हैं, तो वह अनजाने में ही उस संगठन का नाम उन लोगों तक भी पहुँचा देते हैं, जो शायद उससे कभी न जुड़ते।
यह नकारात्मक चर्चा ही समाज में एक बौद्धिक जिज्ञासा को जन्म देती है, जिससे नये लोग संगठन के मूल दर्शन, उसकी कार्यपद्धति तथा उसके साहित्य को स्वयं जांचने के लिए प्रेरित होते हैं।
शत्रुओं के निरंतर प्रहार से संगठन को मानसिक मजबूती, अनुशासन और धैर्य का नि:शुल्क प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है। यदि संगठन इन बाहरी दबावों का उत्तर शांत, संयमित और बौद्धिक गहराई के साथ देता है, तो समाज में उसकी परिपक्वता सिद्ध होने से उस संगठन की प्रतिष्ठा स्वत: बढ़ती है। यह प्रमाणित करता है कि संगठन का नेतृत्व उच्च मानसिक कौशल के संतुलित व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है।
संस्थान के विरोधियों का होना इस बात का स्वतः प्रमाण है कि संगठन का कार्य जमीनी स्तर पर गहरा प्रभाव डाल रहा है और शत्रु स्वत: यह सिद्ध कर देते हैं कि संगठन की उपस्थिति और उसकी शैक्षिक या सामाजिक दिशा विश्व के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संक्षेप में, शत्रु एक ऐसी आग के समान होते हैं जो संगठन के वैचारिक संकल्प को तपाकर कुंदन बना देते हैं। यदि संगठन अपनी मूल दृष्टि पर स्थिर रहे, तो उसके विरोधी ही अंततः उसके सबसे बड़े नि:शुल्क प्रचारक सिद्ध होते हैं।
इसलिये किसी भी संगठन को शत्रुओं से नहीं डरना चाहिये बल्कि उन्हें अपना मुफ्त का प्रचारक समझना चाहिये !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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