विचारकों की असमय हत्या क्यों

सत्ता प्रतिभावान व्यक्तियों से नहीं उनके स्पष्ट विचारों से डरती है

इतिहास गवाह है कि समाज ने हमेशा अपने समय के सबसे प्रखर और प्रतिभावान विचारकों की सदैव हत्या की है ! सुकरात से लेकर ओशो तक, जब भी किसी मेधावी व्यक्ति ने समाज के सामने ‘स्पष्ट और नग्न सत्य’ रखा, तो उसे सत्ताधीशों ने ख़त्म कर दिया।

आज यह एक गंभीर शोध का विषय है कि आखिर मानव समाज, जो प्रगति की कामना करता है, वह प्रगति के वाहकों अर्थात प्रतिभावान व्यक्तियों के स्पष्ट विचारों से इतना डरता क्यों है?

और उसकी हत्या के बाद उसी की मूर्तियों को लगाकर उसके विचारों का प्रचार क्यों करता है ?

सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग यह भली-भांति जानते हैं कि भाषा, मीडिया और शिक्षा प्रणाली के माध्यम से जनमानस के अवचेतन को उन्होंने कैसे नियंत्रित कर रखा है। यह एक प्रकार की वृहद ‘न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग’ है, जो पूरी आबादी को एक भ्रम और आज्ञाकारीता में बनाये रखती है।

जब कोई प्रतिभावान व्यक्ति अपने विचारों की स्पष्टता से उस “लक्ष्मण रेखा” को पार करता है, तो सत्ता में बैठे लोग यह जानते हैं कि, वह व्यक्ति सत्ता के लिये भविष्य की समस्या बन सकता है, और तब सत्ता में बैठे लोगो उसे “विचारों की स्पष्टता” के दोष में ख़त्म कर देते हैं !

स्पष्ट है कि विचारकों का चिंतन जब सत्ता की ‘प्रोग्रामिंग’ को तोड़ कर जनता को सत्ता का नग्न सत्य दिखता है, तब सत्ता की सुरक्षा के लिये ऐसे विचारकों को तुरंत ‘खतरनाक’, ‘सनकी’ या ‘विद्रोही’ घोषित करके ख़त्म कर देने के अलावा सत्ताधीशों के पास कोई विकल्प नहीं बचाता है।

इसलिये ऐसे विचारकों को असमय ही मौत के घाट उतार दिया जाता है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

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