क्या आपने यह महशूश किया कि जब जब निवेश का हर सेक्टर अपने चरम पर होता है तब तब निवेशक अपना लाभ बुक करके निवेश अवसर को पुन: बनाने के लिये पूरी दुनियां में लाशों के ढेर लगा देते हैं ! फिर चाहे वह कोविड का लाकडाउन हो या फिर ईरान इजरायल का युद्ध !
याद किजिये बस दो महीने पहले सोना-चांदी, रियल स्टेट, शेयर बाजार मतलब निवेश का हर अवसर अपने चरम पर था ! बड़े निवेशकों को अपनी पूंजी बढ़ाने के लिये पूरी दुनियां का बाजार गिराना जरुरी था ! इसलिये एक बढ़ा युद्ध मानवता पर थोप दिया गया है !
आज युद्ध परिस्थिती नहीं बल्कि एक नया उद्योग बन गया है ! यह युद्ध मात्र हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं है। आज के दौर में इस उद्योग की जड़ें शेयर बाजार, बैंकिंग सेक्टर और दवा उद्योग तक गहराई से फैल चुकी हैं।
युद्ध अब एक ऐसा जटिल और विस्तृत व्यापार बन गया है, जहाँ मानवीय त्रासदी से कई अलग-अलग कॉर्पोरेट सेक्टर भारी मुनाफा कमाते हैं। इस ‘युद्ध उद्योग’ के विस्तृत पहलू पर हम लोग निष्पक्ष विचार करते हैं ।
युद्ध का सबसे प्रत्यक्ष लाभ रक्षा ठेकेदारों और हथियार निर्माता कंपनियों को होता है। तनाव बढ़ते ही मिसाइलों, ड्रोन्स और लड़ाकू विमानों की मांग बढ़ जाती है, जिससे इन कंपनियों को खरबों डॉलर के सरकारी टेंडर मिलने लगते हैं।
युद्ध की वास्तविक शुरुआत मीडिया के न्यूज़रूम में होती है। ‘वॉर कवरेज’ और आक्रामक नैरेटिव सेट करके युद्ध के महाविनाश के लिये जनता की सहमति तैयार की जाती है। इस सनसनीखेज पत्रकारिता से न्यूज़ चैनलों की टीआरपी और डिजिटल क्लिक्स आसमान छूते हैं। और दोनों पक्षों का पक्ष रखने के लिये बढ़ा पैसा लेते हैं ।
लड़ने के लिए अथाह पूंजी की आवश्यकता होती है। बड़े वैश्विक बैंक और वित्तीय संस्थान सरकारों को भारी ब्याज दरों पर युद्ध हेतु ऋण उपलब्ध करवाते हैं।
कई बार वित्तीय संस्थाएं अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध के दोनों पक्षों को कर्ज देती हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद तबाह हुए देश के पुनर्निर्माण के लिए भी यही बैंक कर्ज देते हैं, जिससे वह देश हमेशा के लिए गहरे ‘ऋण-जाल’ में फंस जाता है।
युद्ध अपने साथ बड़े पैमाने पर रक्तपात, महामारियां और मानसिक आघात लेकर आता है। इसके परिणामस्वरूप, जीवन रक्षक दवाओं, सर्जिकल उपकरणों, एंटीबायोटिक्स और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं की मांग में भारी मात्रा में बढ़ जाती है।
सेना और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों द्वारा की गई बल्क-खरीदारी से दवा कंपनियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।
युद्ध की आहट से ही वैश्विक शेयर बाजारों में भारी अस्थिरता आ जाती है, जिसे बड़े निवेशक भुनाते हैं। जैसे ही कोई संघर्ष शुरू होता है, डिफेंस (रक्षा), क्रूड ऑयल (ऊर्जा) और फार्मा कंपनियों के शेयरों के दाम आसमान छूने लगते हैं। निवेशकों और सट्टेबाजों के लिए युद्ध एक ‘पोर्टफोलियो बूस्टर’ और मुनाफे का बड़ा अवसर बन जाता है।
युद्ध अक्सर छोटे या अस्थिर देशों के प्राकृतिक संसाधनों (जैसे तेल, गैस और खनिज) पर नियंत्रण हासिल करने के लिए भी लड़े जाते हैं, जिसका सीधा फायदा बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होता है। जो दीर्ध कालिक लाभ के लिये ऐसे अवसर ढूंढते रहते हैं।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि युद्ध केवल दो देशों का टकराव नहीं, बल्कि एक ऐसा सुव्यवस्थित ‘इकोसिस्टम’ बन चुका है, जहाँ हथियारों से लेकर बैंकिंग, फार्मा और शेयर बाजार तक के उद्योग फलते-फूलते हैं।
जब तक मानवीय त्रासदी से आर्थिक लाभ कमाने का यह ढांचा मौजूद रहेगा, तब तक दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करना एक अत्यंत कठिन चुनौती बना रहेगी।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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