ब्रह्म तत्व कोई भगवान नहीं देता, यह एक मानसिक प्रक्रिया है, जिसे स्वयं ही अपनी समझ से विकसित करना पड़ता है ! जीव के उत्थान के 7 चरण हैं ! जब जीव इन सातों चरण की जीवन शैली को परिपक्वता के साथ भोग कर गुणातीत हो जाता है, तब वही जीव ब्रह्म हो जाता है !
1. मूढावस्था
इस अवस्था में मनुष्य आलस्य एवं निद्रा के वशीभूत रहता है। यहाँ तमोगुण की प्रधानता होती है। फलस्वरूप लोभ, आलस्य, मोह एवं भ्रान्ति आदि विकार उत्पन्न होते हैं। मनुष्य अधर्ममय एवं अनैतिक कर्मों में प्रवृत्त होकर अज्ञानता में जीवन व्यतीत करता है।
2. विलास अवस्था
इस अवस्था में मनुष्य भोग-विलास में आसक्त रहता है। व्यक्ति अपने चारों तरफ अपने पुरुषार्थ से जाल बुनता है ! यहाँ रजोगुण की प्रधानता होती है। फलतः राग, द्वेष, मोह, हिंसा, दुःख आदि दोष उत्पन्न होते हैं। यह अवस्था मनुष्य के नैतिक पतन का कारण बनती है।
3. द्वंद अवस्था
इस अवस्था में सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। फलतः उत्साह, प्रसन्नता, सुख आदि गुण प्रकट होते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति समाधि के समीप पहुँच सकता है, किन्तु रजोगुणजन्य चंचलता उसे पूर्णतया अध्यात्म-पथ में स्थिर नहीं होने देती।
5. सम्प्रज्ञातावस्था
इस अवस्था में सत्त्वगुण पूर्ण रूप से प्रबल होता है। एकाग्रता की स्थिति में व्यक्ति निर्मल, स्वस्थ एवं अंतर्मुखी हो जाता है। यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि के रूप में भी जानी जाती है।
5. निरुद्धावस्था
यह अवस्था सिद्ध योगियों की होती है। इसमें चित्त की समस्त वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं, और केवल संस्कार मात्र शेष रहते हैं। यह स्थिति शून्यता अथवा परिपूर्ण चैतन्य की अनुभूति का द्योतक मानी जाती है।
6. एकाकार अवस्था
यहाँ साधक के लिये कोई अपना पराया नहीं होता है ! जीव, जंतु, पशु, पक्षी, वनस्पति, दैत्य, दानव, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्न, यक्ष, किन्नर, बेताल, देवता, भगवान, आदि सभी उसके अपने होते हैं ! उसका कोई मित्र या शत्रु नहीं होता है, सृष्टि की सभी योनियाँ उसका परिवार होती हैं !
7. ब्रह्म अवस्था
जब जीव इन 6 मानसिक अवस्थाओं को पार कर लेता है और वह लोक कल्याण के भाव के साथ गुणातीत होकर ईश्वरीय कार्य में सृष्टा का सहायक हो जाता है, तब वह ब्रह्म हो जाता है ! यही जीव की सर्वोच्च अवस्था है ! यहाँ जीव और ब्रह्म का एकाकार हो जाता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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