यह कथन पहली नज़र में विरोधाभासी लग सकता है कि एक आदर्श समाज (शैव ग्राम) को “अनपढ़ और असफल” लोगों की आवश्यकता क्यों है।
लेकिन यदि हम आधुनिक शिक्षा और सफलता के तथाकथित पैमानों (पैसा, पद, और प्रतिस्पर्धा) का विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि इन्होंने मनुष्य को अहंकारी, प्रकृति-विरोधी और तनावग्रस्त बना दिया है।
भगवान शिव ने भी समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों को हमेशा अपने गण के रूप में अपनाया है। यही तो सर्वस्व को स्वीकारना है !
क्योंकि यह अहंकार शून्य होते हैं अत: इनमें सीखने की क्षमता अदभुद होती है ! यदि इन्हें जीवन प्रबंधन सिखा दिया जाये तो यह लोग शिक्षित से अधिक सफल होते हैं !
यह ‘कोरी स्लेट’ होते हैं इसलिये घटना का तटस्थ और गहराई से विश्लेषण कर पाते हैं ! यह समाज से धक्के खाये होते हैं इसलिये इनमें समर्पण अधिक होता है !
इन्हें श्रमदान करने में कोई झिझक नहीं होती है ! यह लोग न्यूनतम आवश्यकता में भी अपना जीवन निर्वाह कर लेते हैं !
यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में जीना अधिक सहजता से सीख लेते हैं ! किताबी ज्ञान के अभाव में, ऐसे लोगों के पास मौसम, मिट्टी और जानवरों को समझने की व्यावहारिक समझ अधिक होती है।
यह लोग लोक कल्याण और सामाज सुधार में बिना भेद भाव के कार्य कर लेते हैं !
इनके पास कुछ भी खोने का भय नहीं होता है इसलिये यह लोग हर परिस्थिती में लम्बे समय तक टिके रहते हैं ! यह लोग माउथ पब्लिसिटी बहुत ही व्यवहारिक तरह से समाज से जुड़ कर कर पाते हैं !
सबसे बड़ी बात अगर समाज के “अनपढ़ और असफल” व्यक्ति का कोई सही मार्गदर्शन नहीं करेगा तो वह कल समाज में दुर्दान्द अपराधी ही बनेंगे ! इसलिये उन्हें शिक्षित व्यक्ति से अधिक प्रमुखता और आश्रय दिये जाने की आवश्यकता है !
मतलब कुल मिला कर शैव ग्राम को “अनपढ़ और असफल” व्यक्ति इसलिए भी चाहिए कि जो प्याला पहले से आधुनिकता के अहंकार और कृत्रिम ज्ञान से भरा है, उसमें प्रकृति और शिव-तत्व का अमृत नहीं डालना अधिक कठिन है।
जबकि समाज का ठुकराया हुआ तथाकथित “अनपढ़ और असफल” व्यक्ति उस खाली प्याले की तरह है, जो अपने भीतर एक नई, आत्मनिर्भर और शाश्वत सभ्यता को जन्म देने की अदभुद क्षमता रखता है। बस उसे आवश्यकता है सही मार्गदर्शन की !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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मोबाईल : 9453092553
