अक्सर इंसान सोचता है कि जीवन को समझने का मतलब सिर्फ खुद को, अपने करियर को, अपने परिवार को या इंसानी समाज को समझ लेना है। लेकिन शिव इस भ्रम को तोड़ते हैं। वह कहते हैं कि जब तक हमारी संवेदनशीलता का दायरा इस पूरी प्रकृति—पशु, पक्षी, जीव-जंतु और वनस्पतियों तक नहीं फैलता, तब तक हमारा आत्म-ज्ञान अधूरा है।
हमारी परस्पर निर्भरता का बोध ही हमारी पूर्णता है ! हम इस सृष्टि से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं हैं। जो प्राण तत्व हमारे भीतर है, वही एक चींटी, एक वटवृक्ष और एक पक्षी में भी बह रहा है। जब हम किसी पौधे में जीवन देखते हैं या किसी पशु के दर्द को महसूस करते हैं, तब हमें समझ आता है कि हम सब एक ही विशाल जीवन-जाल का हिस्सा हैं।
इस रहस्य को जान लेने के बाद हमारे अहंकार का विसर्जन होता है ! तब इंसान अक्सर खुद को ‘सृष्टि का अंश स्वीकार करता’ है, फिर कोई भी उसके लिये पराया नहीं होता है ! जब हमारे भीतर अन्य मूक जीवों के प्रति करुणा और संवेदनशीलता जागती है, तो हमारा अहंकार पिघल जाता है, तब व्यक्ति अहंकार के बिना ही जीवन को सही मायने में समझ पाता है।
इंसान अपनी बात बोलकर कह सकता है, लेकिन वनस्पति और जीव-जंतु मौन रहकर भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति इस मौन को महसूस करने की क्षमता विकसित कर लेता है, उसके भीतर एक अद्भुत गहराई और ठहराव आ जाता है। वह जीवन के उन रहस्यों को जान लेता है जो किताबों में नहीं लिखे हैं ।
यहीं से जीव को पूर्णता की प्राप्ति होती है ! इस बोध के बाद ही व्यक्ति स्वयं में ब्रह्म को अनुभूत करता है ! यही ब्रह्म ऊर्जा अर्थात ईश्वर को जानने का सबसे सरल मार्ग है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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