जिंदगी की बुनियादी जरूरतें बहुत कम हैं, भूख के लिए भोजन, तन के लिए कपड़ा, रहने के लिए छत और मन के लिए थोड़ा सा प्रेम, सम्मान और संतुष्टि । और क्या चाहिये जीने के लिये !
यह सब पाना और इसमें खुश रहना बहुत सरल है। लेकिन उलझन तब शुरू होती है जब हम ‘वह बनने का ढोंग’ करने लगते हैं जो हम असल में हैं ही नहीं।
जब हम समाज को दिखाने के लिए बहुत से नकली मुखौटा पहन लेते हैं, वहीँ से जीवन का संघर्ष शुरू हो जाता है ! वह चाहे अत्यधिक अमीर दिखने का हो, हमेशा खुश दिखने का हो, या सर्वज्ञानी दिखने का हो ! यह सब वह बेड़ियाँ हैं ! जिन्हें चौबीस घंटे संभाले रखना बहुत थका देने वाला होता है।
हम अपनी ऊर्जा जीवन को बेहतर ढंग से जीने की जगह, इस आडम्बर को मैनेज करने में लगा देते हैं, कि लोग हमारे बारे में क्या सोच रहे हैं ?
यह चिन्ता हमारे भीतर ईर्ष्या, असुरक्षा और तनाव पैदा करती है, जिससे सरल सी जिंदगी एक जटिल पहेली बन जाती है।
जो व्यक्ति अपने को पहचान कर अपनी असलियत स्वीकार लेता है, उसे दुनिया के सामने कुछ साबित करने की जरूरत नहीं रहती है। और जिसे कुछ साबित ही नहीं करना है, उसकी जिंदगी से सारे तनाव स्वत: समाप्त हो जाते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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