आज कल बहुत से ध्यान गुरु मौन को बहुत अधिक महत्व देते हैं लेकिन मेरा यह मानना है कि जब तक वैचारिक कुंठायें समाप्त न हो तब तक मौन व्यर्थ का विषय है ।
जब मन के भीतर वैचारिक कुंठाएं, दबे हुए संवेग, या ट्रॉमा चल रहे हों और व्यक्ति बाहर से जबरन मुंह बंद कर ले, तो वह मौन नहीं बल्कि ‘सप्रेशन’ है। जो व्यक्ति को घातक अपराधी बना देता है !
क्योंकि हम जिस विचार को जितना दबाने की कोशिश करते हैं, हमारा अवचेतन मन उस विचार को और अधिक शक्तिशाली बना कर बार-बार हमें लौटता है।
जिससे “ओवरथिंकिंग” और स्व से नकारात्मक बातचीत कई गुना बढ़ जाती है। व्यक्ति बाहर से शांत दिख सकता है, लेकिन भीतर वह एक भयानक मानसिक युद्ध लड़ रहा होता है।
मनुष्य की यही मानसिक अवस्था उसे दोगला और गद्दार तो बनाती ही है, उसे हजार मानसिक रोगों से ग्रसित भी कर देती है !
इसलिये जब तक मन का समस्त कचड़ा सहज संवाद से न निकल जाये, तब तक प्रश्न उठने बंद न हो जायें, तब तक किस गुरु के प्रभाव में हठ पूर्वक लिया मौन अत्यंत घातक होता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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