सैद्धांतिक तौर पर, ‘बुद्धिमत्ता यह जानने में है कि किन चीज़ों को नज़रअंदाज़ करना है।’ जीवन में सफलता के लिए चयनात्मक दृष्टिकोण बहुत आवश्यक है, जिससे “ज्ञान” आपकी प्रगति का एक उपयोगी उपकरण बने, न कि ऐसा भारी बोझ बन जाये, जो आपके आगे बढ़ने की गति ही रोक दे।
क्योंकि “ज्ञान की सीमाएं हैं, लेकिन अज्ञानता अनंत है” यह दार्शनिक विचार मानव मस्तिष्क की क्षमता और ब्रह्मांड की विशालता के बीच के यथार्थ को दर्शाता है। इसे सैद्धांतिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी समझते हैं !
मनुष्य की तार्किकता सीमित है, क्योंकि मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता उसके पास उपलब्ध समय, मस्तिष्क की क्षमता और जानकारी की सीमाओं से बंधी होती है। लेकिन अज्ञानता अनंत है क्योंकि इस दुनिया की हर चीज़ जानना असंभव है।
इसलिए सफल होने के लिए व्यक्ति को केवल उस जानकारी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो उसके तात्कालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों के लिए प्रासंगिक हो।
दूसरी बात समाज भ्रामक सूचना का अतिभार झेल रहा है और सूचना की सत्यता का भी कोई विश्वसनीय मानक नहीं है ! मैं अपने निजी जीवन में पाता हूँ “एआई” पर भी गलत सूचनाओं का भण्डार है ! जिससे समाज बौद्धक रूप से लकवाग्रस्त हो रहा है !
अनावश्यक ज्ञान का अंधाधुंध संग्रह ‘सूचना के अतिभार’ को जन्म देता है। जब हम आवश्यकता से अधिक जानकारी एकत्र करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे संसाधित करने में थक जाता है। मनोविज्ञान में इसे ‘एनालिसिस पैरालिसिस’ कहते हैं, अर्थात बहुत अधिक सोचने और जानने के चक्कर में हम कोई ठोस कदम ही नहीं उठा पाते। कर्म के अभाव में असफलता निश्चित हो जाती है।
जीवन में सफलता के लिए यह पहचानना आवश्यक है कि आपके कार्यक्षेत्र के लिए वह 02% उपयोगी और आवश्यक ज्ञान कौन सा है। शेष 98% ज्ञान अक्सर अनावश्यक होता है, जो केवल हमारी ऊर्जा, ध्यान और समय को नष्ट करता है।
सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना जानते हैं, बल्कि सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपने सीमित ज्ञान का कितना सटीक उपयोग सही व्यक्ति के समक्ष, सही समय पर कर पाते हैं, या नहीं । अनावश्यक ज्ञान का बोझ व्यक्ति को ज़मीनी हकीकत और कर्म से दूर कर देता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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