अगले 90 दिन भारत का प्रसव काल

आज 04 अक्टूबर 2026 है, मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी स्थापना कुंडली, प्रमुख ग्रहों के गोचर और ग्रहणों के प्रभाव से गहराई से जुड़ा होता है। स्वतंत्र भारत की कुंडली वृषभ लग्न और कर्क राशि की है।

प्राचीन ग्रंथों, विशेषकर वराहमिहिर रचित ‘बृहत्संहिता’ के सिद्धांतों को यदि वर्तमान ग्रहीय परिस्थितियों और ग्रहण के गोचर पर लागू किया जाए, तो आगामी 90 दिनों का कालखंड भारत की आंतरिक शांति और सीमा सुरक्षा के लिए अत्यंत संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है।

ग्रहण का प्रभाव केवल उसके घटित होने के दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके बाद के कई महीनों तक यह राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक और भौगोलिक स्थितियों को गहराई से प्रभावित करता है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, जब सूर्य या चंद्र ग्रहण का प्रभाव देश की कुंडली के लग्न (वृषभ) अथवा जनमानस की राशि (कर्क) से केंद्र या त्रिकोण में पड़ता है, तो यह बड़े बदलावों और तनाव का सूचक होता है। आगामी 90 दिनों में ग्रहण बिंदु पर जब मंगल, शनि या राहु जैसे पापी ग्रहों का गोचर या उनकी दृष्टि का संबंध बनता है, तो इसे एक विस्फोटक ग्रहीय स्थिति माना जाता है।

यह स्थिति सत्ता और जनता के बीच अविश्वास पैदा करती है और छिपे हुए शत्रुओं को सक्रिय कर देती है। ग्रहण के इस गोचर में क्रूर ग्रहों का वेध देश को अप्रत्याशित संकटों की ओर धकेलता है।

आंतरिक शांति पर आघात और दंगों के ग्रह योग

किसी भी देश की आंतरिक कानून-व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव का आकलन कुंडली के चतुर्थ (आंतरिक शांति), षष्ठम (शत्रु व उपद्रव) भाव और चंद्रमा से किया जाता है। भारत की राशि कर्क का स्वामी चंद्रमा जनमानस का प्रतिनिधित्व करता है।

अगले 90 दिनों के भीतर मंगल और राहु का आक्रामक संबंध, जिसे ज्योतिष में ‘अंगारक प्रभाव’ कहा जाता है, जब गोचर में सक्रिय होता है, तो यह जनता में उग्रता, असंतोष और भ्रम का संचार करता है।

इसके साथ ही, शनि की क्रूर दृष्टि जब चंद्रमा या चतुर्थ भाव पर पड़ती है, तो यह सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाती है। षष्ठम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि इस अवधि में वैचारिक मतभेद हिंसक रूप ले सकते हैं।

ऐसी ग्रहीय स्थितियों में देश के भीतर धार्मिक या क्षेत्रीय उन्माद, अचानक भड़कने वाले दंगे, विरोध प्रदर्शन और आंतरिक अस्थिरता की प्रबल संभावनाएं जन्म लेती हैं। राहु अफवाहों का कारक है, इसलिए इस दौरान भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से भी उपद्रव फैलने के ज्योतिषीय संकेत मिलते हैं।

बाहरी आक्रमण और युद्ध जैसी स्थितियों का निर्माण

अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ संबंध और बाहरी आक्रमण की स्थिति कुंडली के तृतीय (पड़ोसी) और सप्तम (खुले शत्रु और युद्ध) भाव से देखी जाती है। मेदिनी ज्योतिष में युद्ध का मुख्य कारक सेनापति मंगल और क्रूर ग्रह शनि को माना गया है।

जब भी गोचर में शनि और मंगल एक-दूसरे से समसप्तक (180 डिग्री) दूरी पर होते हैं, या उनके बीच 6-8 (षडाष्टक) का अशुभ संबंध बनता है, तो सीमाओं पर सैन्य तनाव चरम पर पहुंच जाता है।

ग्रहण के प्रभाव क्षेत्र में इन दोनों क्रूर ग्रहों का गोचर यदि तृतीय या सप्तम भाव को पीड़ित कर रहा हो, तो कूटनीतिक वार्ताएं विफल होने लगती हैं। साथ ही, अष्टम भाव जो अचानक आने वाले संकटों और गुप्त हमलों का प्रतीक है, पर अग्नि तत्व वाले ग्रहों का प्रभाव शत्रु देशों द्वारा छद्म युद्ध, सीमा पर घुसपैठ या अचानक सैन्य हमले के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।

मंगल का वक्री या अतिचारी होना इस बात का प्रमाण होता है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियां तेज होंगी और दोनों ओर से आक्रामक रणनीतियां अपनाई जाएंगी।

वर्तमान ग्रहीय स्थितियां और ग्रहण का गोचर भारत के लिए अगले तीन महीनों तक दोहरे मोर्चे पर चुनौती पेश कर रहे हैं। भीतर दबे हुए सामाजिक असंतोष का विस्फोट और सीमाओं पर शत्रु राष्ट्रों की आक्रामक घेराबंदी, दोनों ही मेदिनी ज्योतिष के स्पष्ट संकेत हैं।

किन्तु इस झंझावात से निकलने के बाद भारत नये दृष्टि से अपने भविष्य का निर्माण करेगा !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2577

Newsletter Updates

Enter your email address below and subscribe to our newsletter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *