प्राय: लोग जीवन की चुनौतियों, पारिवारिक कलह या असफलताओं से भागने के लिए ‘धर्म’ या ‘वैराग्य’ का चोला ओढ़ लेते हैं। इसे पलायनवाद कहा जाता है, आध्यात्मिकता नहीं।
गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों में सबसे श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसी पर समाज टिका है। विवाह एक वचन है और दांपत्य जीवन के कुछ नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व होते हैं। अपने जीवनसाथी को मझधार में छोड़कर या बच्चों को उनके हाल पर छोड़कर संन्यासी बन जाना या सब कुछ दान कर देना स्वार्थ है।
जब व्यक्ति अपने गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभा लेता है, जैसे बच्चों को स्वावलंबी बनाना, परिवार को सामाजिक और आर्थिक रूप से स्थिर करना, तब वह ‘वानप्रस्थ’ या ‘संन्यास’ की ओर कदम बढ़ाने का सच्चा अधिकारी बनता है।
ईश्वर पूरी सृष्टि का रचयिता है, उसे आपके धन या संपत्ति की आवश्यकता नहीं है। धर्म गुरुओं द्वारा संचालित संस्थाओं को धन की आवश्यकता हो सकती है, ईश्वर को नहीं।
जब तक आपके कंधे पर सांसारिक जिम्मेदारियां हैं, तब तक आपका कर्म ही आपकी सबसे बड़ी पूजा है। अपनी आय का एक छोटा हिस्सा (जैसे 5 या 10 प्रतिशत) समाज कल्याण, गरीबों की शिक्षा या चिकित्सा के लिए निकालना एक स्वस्थ और संतुलित दृष्टिकोण है।
“सर्वस्व दान” का अधिकार केवल उस व्यक्ति को है जिसने जीवन के हर ऋण (पितृ ऋण, देव ऋण, मनुष्य ऋण) को चुका दिया है और जिसके पीछे रोने या परेशान होने वाला कोई आश्रित नहीं बचा है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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