विचलित मन जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है, और ज्ञान से प्रकाशित स्थिर मन असीम आनंद का द्वार है।
संसार में मनुष्य की सबसे बड़ी खोज भौतिक संपदा नहीं, बल्कि मानसिक शांति है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को हमारे मन, संवेदनाओं और विचारों का उद्गम माना गया है, जबकि बृहस्पति (गुरु) ज्ञान, विवेक, और धर्म का प्रतीक है। जब जन्म कुण्डली में चंद्रमा और गुरु एक-दूसरे से केंद्र में (अर्थात 1, 4, 7 या 10वें भाव में) विराजमान होते हैं, तब ‘गजकेसरी योग’ का पवित्र निर्माण होता है। यह मात्र एक ज्योतिषीय संयोग नहीं है, बल्कि मानव चेतना के उच्चतम विकास का एक उत्कृष्ट सूत्र है।
‘गज’ का अर्थ है हाथी, जो अथाह शक्ति, गंभीरता और धैर्य का प्रतीक है। वहीं ‘केसरी’ का अर्थ है सिंह, जो अदम्य साहस, निर्भयता और नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जब मन (चंद्र) को ज्ञान (गुरु) का आश्रय मिल जाता है, तब मनुष्य के भीतर हाथी जैसा धीरज और सिंह जैसा अदम्य साहस एक साथ जन्म लेते हैं।
ऐसे व्यक्ति के जीवन में चाहे कितनी भी भयंकर विपदाएं आएं, उसका मन कभी उद्वेलित नहीं होता। वह व्यक्ति आभासी संसार के कोलाहल और सतही बहसों में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करता, बल्कि गहन चिंतन और प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से सत्य को जानने का प्रयास करता है।
आज के युग में जहाँ मनुष्य दिखावे और कृत्रिम जीवनशैली का दास बन चुका है, वहां गजकेसरी योग हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है। जिसके पास यह योग है, वह स्वाभाविक रूप से प्रकृति प्रेमी, स्वावलंबी और समाज का सच्चा मार्गदर्शक होता है।
वह जानता है कि सच्चा सुख किसी बाह्य वस्तु में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के पुरुषार्थ और प्रकृति के सान्निध्य में है। किंतु, यदि जन्म कुण्डली में यह योग न भी हो, तब भी मनुष्य अपने कर्म और पुरुषार्थ से इस योग की ऊर्जा को अपने भीतर जागृत कर सकता है।
इसके लिये तीन उपचार क्रियाएं कीजिये !
पहला प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करना ! चंद्रमा और गुरु की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए भूमि और प्रकृति से जुड़ना सबसे सशक्त माध्यम है। फलदार वृक्षों का रोपण करना, वन्य जीवों व पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास की व्यवस्था करना तथा मिट्टी से बने भवनों में निवास करना या समय बिताना मानसिक विकारों को शांत करता है।
दूसरा स्वाध्याय एवं प्रत्यक्ष संवाद करना ! मन के भटकाव को रोकने के लिए श्रेष्ठ दर्शन, मनोविज्ञान और जीवन प्रबंधन के साहित्य का नित्य अध्ययन करें। भ्रमित करने वाले आभासी संचार माध्यमों से दूर रहकर, अनुभवी और ज्ञानी व्यक्तियों के साथ आमने-सामने बैठकर सीधा संवाद करें। सीधा संवाद ही विचारों की उलझन को सुलझाता है और गुरु ग्रह को असीम बल प्रदान करता है।
तीसरा सात्विक और प्राकृतिक आहार का सेवन करना ! मन का सीधा संबंध हमारे भोजन से है। अपरिष्कृत (बिना रगड़ वाले) प्राकृतिक चावल, तरोई, लौकी, परवल, मूंग की दाल और शुद्ध देशी घी जैसे सात्विक और सुपाच्य आहार का सेवन करें। यह शरीर के स्नायु तंत्र को शीतलता प्रदान करता है, उत्तेजना को समाप्त करता है और विचारों में निर्मलता लाता है।
यह गजकेसरी योग हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने में नहीं है, बल्कि अपने भीतर सोई हुई शक्तियों को पहचानने में है। जब ज्ञान रूपी गुरु हमारे चंचल मन रूपी चंद्रमा का मार्गदर्शन करता है, तब जीवन की हर आपदा एक नए उदय का कारण बन जाती है। ज्योतिष विद्या का परम लक्ष्य भी यही है कि मनुष्य अपनी दुर्बलताओं को समझे और प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए स्वयं को एक सशक्त, स्वतंत्र और आत्म-निर्भर इकाई के रूप में स्थापित करे।
यह अध्याय इस कड़वे किंतु शाश्वत सत्य की उद्घोषणा करता है कि सच्ची शांति बाज़ारों में या कृत्रिम जीवन शैली में नहीं, बल्कि हमारी अपनी चेतना की गहराई और मिट्टी की सौंधी महक में ही रची-बसी है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने स्वयं के पुरुषार्थ से अपने जीवन की गीता रचे और एक राज-ऋषि की भांति जीवन व्यतीत करे, जो संसार में रहते हुए भी उसके विकारों से मुक्त हो। मन को साधना ही संपूर्ण ब्रह्मांड को साधने के समान है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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