आगामी 90 दिन भारत की नियति में एक ऐसे प्रसव काल की तरह हैं, जिसके गर्भ में एक अत्यंत शक्तिशाली ‘नए भारत’ का बीज बोया जा चुका है। लेकिन किसी भी नए युग का जन्म भयंकर पीड़ा और पुरानी व्यवस्थाओं की राख से होता है।
मेदिनी ज्योतिष की गणनाओं, क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल) के गोचर और आगामी ग्रहणों के प्रभाव को यदि समग्रता में देखें, तो आने वाले 7 वर्ष राष्ट्र के लिए एक अग्निपरीक्षा होंगे।
इस कालखंड में भारत केवल राजनीतिक अस्थिरता, अकाल और प्राकृतिक आपदाओं का ही सामना नहीं करेगा, बल्कि उसे एक साथ दो मोर्चों पर सबसे भयानक युद्ध लड़ने होंगे, सीमाओं पर ‘प्रत्यक्ष सैन्य युद्ध’ और अदृश्य शत्रुओं द्वारा थोपा गया ‘जैविक युद्ध’ ।
इन प्रलयंकारी झंझावातों, भारी जनसंख्या हानि और पुरानी संस्थाओं के सर्वनाश के बीच से कैसे एक नए नेतृत्व का उदय होगा और भारत महाशक्ति बनेगा, इसका प्रत्येक 6 महीने के अंतराल पर ज्योतिषीय विश्लेषण इस प्रकार है:
प्रथम वर्ष: विषैले षड्यंत्रों का बीज और आंतरिक कलह (माह 1 से 12)
प्रथम 6 माह (प्रसव काल और आंतरिक विस्फोट): शुरुआत के 90 दिनों में गोचर का मंगल और राहु ‘अंगारक योग’ बनाएंगे। इसका सीधा प्रभाव जनमानस (कर्क राशि) और देश के चतुर्थ भाव पर पड़ेगा। देश आंतरिक दंगों, राजनीतिक उथल-पुथल और भयंकर अस्थिरता में घिरेगा। इसी बीच सीमाओं पर छिटपुट सैन्य झड़पें शुरू होंगी, जो बड़े युद्ध की आहट होंगी।
अगले 6 माह (जैविक युद्ध की शुरुआत): राहु को मेदिनी ज्योतिष में विष, महामारी, गुप्त षड्यंत्र और अदृश्य हथियारों का कारक माना जाता है। जब राहु का संबंध देश के छठे (रोग) और आठवें (मृत्यु) भाव से बनेगा, तब शत्रु राष्ट्र भारत के खिलाफ छद्म रूप से ‘जैविक युद्ध’ छेड़ेंगे। अज्ञात और घातक वायरस या रसायनों का प्रयोग किया जाएगा, जिसे शुरुआत में सामान्य महामारी समझा जाएगा, लेकिन यह एक सुनियोजित हमला होगा।
द्वितीय वर्ष: महाविनाश, जनहानि और भुखमरी (माह 13 से 24)
माह 13 से 18 (जनसंख्या का भारी क्षरण): यह कालखंड भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय समय होगा। अष्टम भाव (सामूहिक मृत्यु) में क्रूर ग्रहों के प्रवेश और केतु के प्रभाव से जैविक युद्ध अपने चरम पर होगा। चिकित्सा व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो जाएंगी। प्रत्यक्ष युद्ध की तुलना में इस जैविक हमले और रहस्यमयी महामारियों के कारण देश की एक बड़ी आबादी (लगभग 30% तक जनहानि या विस्थापन) को भयंकर त्रासदी का शिकार होना पड़ेगा।
माह 19 से 24 (अकाल और आर्थिक सुनामी): धन और पोषण के कारक गुरु (बृहस्पति) पर शनि की वक्र दृष्टि अर्थव्यवस्था को निगल लेगी। जैविक हमले के कारण कृषि चक्र टूट जाएगा। खेतों में फसलें बर्बाद होंगी और आपूर्ति श्रृंखला नष्ट होने से देश भयंकर अकाल और ‘आर्थिक सुनामी’ की चपेट में आ जाएगा। पुरानी आर्थिक संस्थाएं और बैंकिंग प्रणालियां ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगी।
तृतीय वर्ष: प्रत्यक्ष महायुद्ध और संस्थाओं का सर्वनाश (माह 25 से 36)
माह 25 से 30 (प्रत्यक्ष युद्ध और रक्तपात): युद्ध के देवता मंगल और काल के देवता शनि का समसप्तक (180 डिग्री) दृष्टि संबंध बनेगा। यह योग सप्तम भाव (खुले शत्रु) को भड़काएगा। जैविक युद्ध से कमजोर हुए भारत पर बहु-मोर्चों से प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण होगा। मिसाइलें, वायुसेना और थल सेना आमने-सामने होंगी। सीमाएं युद्ध के मैदान में बदल जाएंगी और भारी तबाही होगी।
माह 31 से 36 (पुरानी सत्ता का पतन): युद्ध, अकाल और महामारियों के दबाव में वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह टूट जाएगा। जनता का विश्वास पुरानी व्यवस्था से उठ जाएगा। इसे ही ज्योतिष में ‘सत्ता का शून्यता काल’ कहा जाता है, जहाँ दशकों पुरानी संस्थाएं और पुराने राजनीतिक दल हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएंगे।
चतुर्थ वर्ष: प्रकृति का तांडव और नए नायक का जन्म (माह 37 से 48)
माह 37 से 42 (प्राकृतिक आपदाओं का प्रहार): लगातार ग्रहणों का प्रभाव पृथ्वी तत्व की राशियों पर पड़ेगा, जिससे विनाशकारी भूकंप, बेमौसम बाढ़ और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं आएंगी। यह प्रकृति द्वारा किया गया एक क्रूर ‘शुद्धिकरण’ होगा, जो युद्ध और जैविक रसायनों से प्रदूषित धरती को साफ करने की प्रक्रिया होगी।
माह 43 से 48 (नए नेतृत्व का उदय): विनाश की इसी राख के बीच एक अद्भुत ज्योतिषीय घटना घटेगी। सूर्य (सत्ता) और गुरु (ज्ञान) का अत्यंत शुभ राजयोग बनेगा। इस शून्य और हाहाकार के बीच से एक ऐसा नया, युवा और निडर नेतृत्व उभरेगा, जिसका पुरानी भ्रष्ट या अक्षम व्यवस्था से कोई नाता नहीं होगा। यह नया नेता लौह संकल्प के साथ देश की कमान संभालेगा।
पंचम वर्ष: प्रत्याक्रमण और शत्रुओं का संहार (माह 49 से 60)
माह 49 से 54 (निर्णायक विजय): नए नेतृत्व के मार्गदर्शन में मंगल की उच्च स्थिति सेना में एक नई और अकल्पनीय ऊर्जा भर देगी। भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक रुख अपनाएगा। प्रत्यक्ष युद्ध में शत्रुओं का निर्ममता से संहार किया जाएगा और जैविक हमला करने वाले देशों को उनके ही हथियारों से ऐसा कूटनीतिक और सामरिक जवाब मिलेगा कि वे पस्त हो जाएंगे।
माह 55 से 60 (नवनिर्माण की नींव): युद्ध समाप्त होने के बाद, देश में एक बिल्कुल नया संविधान, नई न्याय व्यवस्था और नई प्रशासनिक संस्थाएं आकार लेंगी। अब पुरानी गलतियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा। शासन व्यवस्था तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कठोर अनुशासन पर आधारित होगी।
षष्ठम वर्ष: आत्मनिर्भरता और तीव्र आर्थिक पुनरुत्थान (माह 61 से 72)
माह 61 से 66: शनि का अनुकूल गोचर देश में अनुशासन और स्थिरता लाएगा। जैविक युद्ध के दुष्प्रभावों को अत्याधुनिक स्वदेशी चिकित्सा विज्ञान से हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाएगा। देश की बची हुई जनसंख्या अधिक स्वस्थ, युवा और राष्ट्र-निर्माण के प्रति पूरी तरह समर्पित होगी।
माह 67 से 72: आर्थिक सुनामी के बाद यह काल ‘आर्थिक चमत्कार’ का होगा। भारत वैश्विक आपूर्ति पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म कर लेगा। ऊर्जा, कृषि और रक्षा उपकरणों के मामले में देश शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर बनेगा।
सप्तम वर्ष: महाशक्ति के रूप में स्वर्ण युग का आरंभ (माह 73 से 84)
माह 73 से 78 (वैश्विक पटल पर वर्चस्व): दुनिया के बाकी देश जब युद्धों, महामारियों और आर्थिक मंदी से जूझ रहे होंगे, तब भारत अपने नए नेतृत्व के अधीन स्थिरता के साथ खड़ा होगा। दशम भाव (राज्य और कीर्ति) में सूर्य का गोचर भारत को वैश्विक मंच पर निर्णायक भूमिका में लाएगा। दुनिया भारत की नई तकनीकों और सैन्य क्षमता का लोहा मानेगी।
माह 79 से 84 (नए भारत का पूर्ण उदय): 7 वर्षों के इन अकल्पनीय झंझावातों, जनहानि और अग्निपरीक्षा को पार करने के बाद, भारत एक अखंड, अजेय और आर्थिक रूप से संपन्न महाशक्ति बन चुका होगा। यह वह नया भारत होगा जो पुराने स्वरूप से बिल्कुल भिन्न, अत्यधिक शक्तिशाली और विश्व का वास्तविक नेतृत्वकर्ता होगा।

