संसार के भोगों में आसक्ति और मुक्ति की कामना, यह दोनों प्रवृत्तियां एक-दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, जैसे पूर्व और पश्चिम दिशा। एक ही समय में इन दोनों की इच्छा करना आध्यात्मिक मार्ग पर एक गहरा विरोधाभास है !
मुक्ति का मूल आधार वैराग्य है, जिसका अर्थ है संसार के नश्वर सुखों से मोह भंग होना। दूसरी ओर, संसार का रस लेने की प्रबल इच्छा राग (आसक्ति) को जन्म देती है। एक ही अंतःकरण में मोह और निर्मोह एक साथ नहीं टिक सकते। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक ही स्थान पर प्रकाश और अंधकार का एक साथ होना असंभव है।
संसार के सुखों को भोगने के लिए चेतना को बहिर्मुखी होना पड़ता है, जिससे इंद्रियां निरंतर बाहरी भौतिक विषयों में भटकती रहती हैं। इसके विपरीत, मुक्ति के लिए चेतना का अंतर्मुखी होकर पूर्णतः स्व में स्थिर होना अनिवार्य शर्त है। बाहर की ओर दौड़ता हुआ बिखरा मन कभी भी सत्य या परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता।
परमात्मा विशुद्ध सत्य और सरलता का स्वरूप है। जब मनुष्य भीतर से सांसारिक सुखों की लालसा रखता है और केवल बाहरी तौर पर मुक्ति की बातें करता है, तो यह चेतना का दोहरापन बन जाता है। ईश्वर इस आचरण को इसलिए अस्वीकार करते हैं क्योंकि इसमें निष्कपट समर्पण का अभाव होता है। परम सत्ता किसी भी प्रकार की वैचारिक मिलावट या आधी-अधूरी निष्ठा से प्राप्त नहीं होती, वहां शत-प्रतिशत समर्पण आवश्यक है।
प्रकृति का नियम अत्यंत स्पष्ट है कि कारण के अनुरूप ही कार्य होता है। यदि चिंतन और कर्म संसार का रस निचोड़ने के लिए किए जा रहे हैं, तो उसका फल सांसारिक बंधन ही होगा। मुक्ति का फल केवल निष्काम कर्म और अनासक्ति के बीजों से ही उत्पन्न हो सकता है।
जो व्यक्ति संसार और परमार्थ दोनों को एक साथ मुट्ठी में बांधना चाहता है, उसकी स्थिति दो विपरीत दिशाओं में जाने वाली नावों पर एक साथ पैर रखने वाले यात्री के समान होती है, जिसका परिणाम अंततः पतन ही होता है।
सत्य के मार्ग पर चलने वाले साधक को यह स्पष्ट निर्णय लेना ही पड़ता है कि उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है। संसार की नश्वरता को निरंतर भोग कर नहीं, बल्कि उसके सत्य को गहराई से समझ कर और भीतर से मुक्त होकर ही परम अवस्था की प्राप्ति संभव है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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