संसार प्रवृत्ति से निवृत्ति की यात्रा है

भारतीय दर्शन और सनातन परम्परा में ‘संसार’ केवल एक भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि यह आत्मा के क्रमिक विकास की एक प्रयोगशाला है। मानव जीवन का चरम लक्ष्य इसी संसार में रहते हुए पूर्णता को प्राप्त करना है।

वेदों और शास्त्रों ने इस जीवन यात्रा को दो मुख्य मार्गों में विभाजित किया है. प्रवृत्ति (संसार की ओर जाना, कर्म में प्रवृत्त होना) और निवृत्ति (संसार से लौटना, वैराग्य और मोक्ष)।

वास्तव में, संसार का सम्पूर्ण ढाँचा हमें प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाने के लिए ही रचा गया है।

प्रवृत्ति का अर्थ है सांसारिक कर्तव्यों, इच्छाओं और कर्मों में संलग्न होना। निवृत्ति का अर्थ है उन इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होकर अपने मूल आत्म-स्वरूप (परमात्मा) की ओर लौटना।

आदि शंकराचार्य ने श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य की प्रस्तावना में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में वैदिक धर्म का सार बताते हुए लिखा है:

“द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः, प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणश्च।”

(अर्थात: वेदों में दो ही प्रकार के धर्मों का वर्णन है. पहला प्रवृत्ति-रूप धर्म (संसार को चलाने के लिए) और दूसरा निवृत्ति-रूप धर्म (मोक्ष के लिए)।)

मनुष्य जब जन्म लेता है, तो वह अनेक कामनाओं और कर्मों के बन्धन से युक्त होता है। संसार में आकर धर्मपूर्वक अर्थ (धन) और काम (इच्छाओं) की पूर्ति करना प्रवृत्ति मार्ग है। यह मार्ग अनुचित नहीं है, बल्कि यह यात्रा का पहला चरण है। किन्तु जो केवल प्रवृत्ति में उलझकर रह जाते हैं और निवृत्ति को नहीं पहचानते, उन्हें शास्त्रों में अज्ञानी माना गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता (16.7) में भगवान श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों की पहचान बताते हुए कहते हैं:

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥

(अर्थात: आसुरी स्वभाव वाले लोग यह नहीं जानते कि किस कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए (प्रवृत्ति) और किस कर्म से निवृत्त होना चाहिए (निवृत्ति)। न उनमें पवित्रता होती है, न श्रेष्ठ आचरण और न ही सत्य।)

जीवन की सार्थकता इसी में है कि मनुष्य सही समय पर प्रवृत्ति (भोग) से निवृत्ति (योग) की ओर मुड़ जाए। यह बदलाव तब आता है जब मनुष्य में ‘विवेक’ जाग्रत होता है। कौन सा कर्म बन्धन का कारण है और कौन सा मोक्ष का, यह जानने वाली बुद्धि ही श्रेष्ठ है।

श्रीमद्भगवद्गीता (18.30) में सात्त्विक बुद्धि की परिभाषा देते हुए कहा गया है:

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

(अर्थात: हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वही सात्त्विकी बुद्धि है।)

मनुष्य का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं है। प्रवृत्तिमूलक कर्मों से स्वर्ग या भौतिक सुख मिल सकता है, किन्तु जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति केवल निवृत्तिमूलक कर्मों (निष्काम कर्म और ज्ञान) से ही मिलती है।

मनुस्मृति (12.89) इस सत्य को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित करती है:

सुखं काममवाप्नोति कृत्वा कर्म प्रवृत्तकम् ।

निवृत्तं सेवमानस्तु सर्वान्कामान्व्यपोहति ॥

(अर्थात: प्रवृत्ति मार्ग के सकाम कर्मों को करके मनुष्य सांसारिक सुखों को प्राप्त करता है, परन्तु निवृत्ति मार्ग (निष्काम कर्म/ज्ञान) का सेवन करने वाला पुरुष सभी कामनाओं को पार कर जाता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेता है।)

निवृत्ति का अर्थ कर्मों को छोड़ना नहीं, बल्कि ‘कर्म-फलों की आसक्ति’ को छोड़ना है। जब मनुष्य संसार से निवृत्त होने लगता है, तो उसके भीतर का विकार समाप्त हो जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता (2.59) में भगवान कहते हैं:

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

(अर्थात: इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति (रस) निवृत्त नहीं होती। किन्तु परम तत्त्व (परमात्मा) का साक्षात्कार हो जाने पर उसकी वह आसक्ति भी पूर्णतः निवृत्त हो जाती है।)

आश्रम व्यवस्था: प्रवृत्ति से निवृत्ति का व्यावहारिक मॉडल

सनातन धर्म की ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ इस यात्रा का सबसे बड़ा व्यावहारिक प्रमाण है।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम वास्तव में यह विशुद्ध रूप से ‘प्रवृत्ति’ का काल है। इसमें व्यक्ति विद्या ग्रहण करता है, धन कमाता है, विवाह करता है और समाज तथा पितरों का ऋण चुकाता है।

वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम: यह ‘निवृत्ति’ का काल है। जब व्यक्ति की आयु ढलने लगती है, तब वह परिवार और समाज की मोह-माया से स्वयं को धीरे-धीरे समेट (निवृत्त कर) लेता है और अपना पूरा ध्यान ईश्वर और मोक्ष पर केन्द्रित करता है।

उपर्युक्त शास्त्र-प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि संसार न तो भागने की जगह है और न ही हमेशा के लिए उलझे रहने की। संसार एक पाठशाला है।

प्रवृत्ति बीज है, तो निवृत्ति उसका फल है। प्रवृत्ति संसार रूपी नदी में उतरना है, और निवृत्ति उस नदी को पार करके उस पार (परमार्थ) पहुँच जाना है।

जो व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में प्रवृत्ति का त्याग कर निवृत्ति को अपना लेता है, वही इस संसार रूपी यात्रा में वास्तविक विजय प्राप्त करता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परमानन्द (मोक्ष) का अधिकारी बनता है।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2614

Newsletter Updates

Enter your email address below and subscribe to our newsletter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *