मुक्ति की अवधारण मानसिक रोगियों की सोच है

मध्यकाल से लेकर आधुनिक युग तक, धर्म गुरुओं और सांप्रदायिक व्याख्याकारों ने मोक्ष की जो स्वार्थी और पलायनवादी धारणा गढ़ी, उसने संपूर्ण समाज की ऊर्जा को कुंठित कर दिया।

जब मुक्ति को संसार से भागकर जंगलों या आश्रमों में छिपने का पर्याय मान लिया गया, तो समाज अपने मूल पुरुषार्थ और दायित्वों से कटता चला गया।

इस भ्रांत धारणा ने समाज को कैसे विमुख किया, इसे निम्नलिखित प्रमाणों और तर्कों से सिद्ध किया जा सकता है:

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत के सूत्र की भी इन धर्म गुरुओं ने भ्रामक अवधारणा स्थापित कर दी, कि यह संसार केवल एक माया, भ्रम और दुखों का घर है, और इसका एकमात्र समाधान यहाँ से भाग जाना है या सन्यास ले लेना है !

जब किसी समाज के मन में यह भ्रामक अवधारणा गहराई से बैठा दिया जाता है, तब उस देश में भौतिक जगत, राष्ट्र, और परिवार सब व्यर्थ हो जाते हैं, वह समाज अपने विकास, सुरक्षा और समृद्धि के लिए प्रयास करना छोड़ देता है !

 इसी वैचारिक शून्यता के कारण समाज में विज्ञान, अर्थशास्त्र, और रक्षा व्यवस्था का पतन होता है, क्योंकि श्रेष्ठ मस्तिष्कों ने संसार को सुधारने के बजाय उसे छोड़ना उचित समझते हैं, इसीलिये बड़े बड़े डाक्टर, वैज्ञानिक, प्रबुद्ध जन अपना कार्य छोड़ कर सन्यास ले रहे हैं।

जबकि सनातन परंपरा में जीवन को चार स्तंभों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—में पिरोया गया था। यह एक क्रमिक यात्रा थी। बिना धर्म (कर्तव्य) और अर्थ (समृद्धि) के मोक्ष की कल्पना भी नहीं की गई थी। परंतु बाद के उपदेशकों ने सीधे मोक्ष को ही एक मात्र लक्ष्य घोषित कर दिया।

परिणाम यह हुआ कि ‘अर्थ’ (संपन्नता) को पाप और लालच से जोड़ दिया गया। एक ऐसा समाज जो समृद्धि को आध्यात्मिक पतन का कारण मानने लगे, वह दरिद्रता और दासता की ओर ही अग्रसर होगा।

जबकि अष्टावक्र जैसे दर्शन ‘अहंकार और आसक्ति’ के त्याग को संन्यास कहते हैं, कर्मों के त्याग को नहीं। परंतु धर्म गुरुओं ने वस्त्र बदलने और कर्मों से भागने को संन्यास घोषित कर दिया।

जो युवा भुजाएं और मेधा समाज के निर्माण, कृषि, और प्रशासन में लगनी चाहिए थीं, वह भिक्षाटन और कर्मकांडों में उलझ गईं। समाज अपने सबसे योग्य और वैचारिक रूप से प्रखर लोगों के योगदान से वंचित हो गया।

मोक्ष की इस भ्रांत धारणा ने व्यक्ति को नितांत स्वार्थी बना दिया। व्यक्ति केवल अपनी व्यक्तिगत मुक्ति, अपने स्वर्ग, और अपने पुण्यों का हिसाब रखने लगा। पड़ोसी भूखा हो, राष्ट्र पर आक्रमण हो रहा हो, या समाज में अन्याय हो रहा हो, इन सबसे आंखें मूंदकर केवल माला जपना और अपनी मुक्ति की कामना करना एक प्रकार का आध्यात्मिक अंधापन बन गया।

इस स्वार्थ पूर्ण सोच ने सामूहिक शक्ति (संगठन) और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को नष्ट कर दिया।

जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मध्य में खड़े होकर अकर्मण्यता का घोर विरोध किया। श्री राम ने आदर्श राज्य की स्थापना के लिए भयंकर युद्ध किया। इन सभी ने ‘स्व में स्थिर’ रहते हुए सर्वोच्च सामाजिक पुरुषार्थ किया।

परंतु बाद के व्याख्याकारों ने इन कर्मयोगी आदर्शों को केवल भावुकता और कर्मकांडों तक सीमित कर दिया।

निष्कर्ष यह है कि  मुक्ति को संसार के बाहर किसी शून्य में खोजने का विषय नहीं है ! यह सबसे बड़ा और भ्रामक अज्ञान है।

जब तक समाज मोक्ष की इस पलायनवादी धारणा को त्याग कर, अपने दायित्वों के निर्वहन को ही सच्चा पुरुषार्थ नहीं मानेगा, तब तक न तो समाज का उदय होगा और न ही धर्म की वास्तविक स्थापना होगी।

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये

मोबाईल : 9453092553

Share your love
yogeshmishralaw
yogeshmishralaw
Articles: 2614

Newsletter Updates

Enter your email address below and subscribe to our newsletter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *