सफल व्यक्ति में संत खोजने की नासमझी
संसार के हर देश की अपनी एक अलग तासीर है, अपना एक अलग मनोविज्ञान है। किंतु भारत के जनमानस की सोच सबसे विचित्र और गहरे अंतर्विरोधों से घिरी हुई है।
यहाँ के आम इंसान की एक बहुत बड़ी विडंबना यह है कि वह हर सफल व्यक्ति के भीतर एक ‘संत’ के दर्शन करना चाहता है। समाज तब तक किसी सफल व्यक्ति को सच्चे मन से सम्मान नहीं देता, जब तक कि वह उस व्यक्ति पर त्याग, वैराग्य और संतत्व का आवरण न देख ले।
यहीं से भारतीय मनोदशा की सबसे बड़ी नासमझी और वैचारिक उलझन की शुरुआत होती है।
संसार में सफलता प्राप्त करने का सीधा सा अर्थ है, प्रतिस्पर्धा में भाग लेना और उसमें विजयी होना। एक सफल व्यक्ति को अत्यंत महत्वाकांक्षी, व्यावहारिक, संघर्षशील और अपनी योजनाओं के प्रति आक्रामक होना पड़ता है।
इसके ठीक विपरीत, एक संत वह है जो इस सांसारिक दौड़ से बाहर आ चुका है, जिसने प्रतिस्पर्धा से स्वयं को मुक्त कर लिया है और जो किसी को पछाड़ने की महत्वाकांक्षा नहीं रखता।
हर भारतीय अवचेतन रूप से यह सत्य भली-भांति जानता है कि जो व्यक्ति संसार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भाग गया हो, वह कभी भौतिक जगत में सफल नहीं हो सकता। सफलता के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में उतरकर लड़ना पड़ता है, जबकि एक पारंपरिक संत उस युद्ध के मैदान से दूर विश्राम में होता है।
हम भली-भांति जानते हैं कि सफलता युद्ध मांगती है, फिर भी हमारी यह सामूहिक नासमझी है कि हम चाहते हैं कि जो व्यक्ति लड़कर, जूझकर और दुनिया को पछाड़कर सफलता के शिखर पर पहुँचा है, वह हमारे सामने आकर एक त्यागी संत की तरह व्यवहार करे।
हमने सदियों से ‘त्याग’ को इतना अधिक महिमामंडित कर दिया है कि हम शुद्ध ‘पुरुषार्थ’ और ‘कर्म’ का सीधा सम्मान करना भूल गए हैं।
जब हम किसी सफल व्यक्ति को देखते हैं, तो हम उसकी योग्यता, उसके श्रम और उसकी बौद्धिक क्षमता का सम्मान करने के बजाय, यह उम्मीद करते हैं कि वह सन्यासी की तरह बोले, अपनी सफलता का तिरस्कार करे और अत्यधिक विनम्रता का दिखावा करे।
इस झूठी अपेक्षा का सबसे भयंकर परिणाम यह हुआ है कि हमारे समाज में ‘पाखंड’ को बढ़ावा मिला है। क्योंकि भारतीय समाज केवल संत के वेश को पूजता है, इसलिए हर सफल व्यक्ति को समाज से इज्जत पाने के लिए संत होने का झूठा नाटक करना पड़ता है। सफलता के लिए कठोर निर्णय लेने वाला व्यक्ति, समाज के सामने आकर अत्यधिक वैरागी होने का अभिनय करता है। हमारी इसी नासमझी के कारण ईमानदार सफल लोगों की जगह पाखंडियों ने ले ली है।
एक विचारक के रूप में मैं यह स्पष्ट देखता हूँ कि जब तक हम चीजों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखना नहीं सीखेंगे, तब तक हम इस मानसिक उलझन से बाहर नहीं आ सकते।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि सफलता का अपना एक अलग तेज और स्वभाव है, और संतत्व की अपनी एक अलग अवस्था।
दोनों को आपस में मिलाना मूर्खता है। हमें सफल व्यक्ति को उसके पुरुषार्थ, उसकी लगन और उसकी योग्यता के लिए सम्मान देना सीखना चाहिए, न कि उसमें ज़बरदस्ती एक संत को खोजना चाहिए।
जिस दिन भारतीय जनमानस सफलता को सफलता के रूप में और वैराग्य को वैराग्य के रूप में बिना किसी मिलावट के स्वीकार करना सीख जाएगा, उसी दिन यह समाज पाखंड से मुक्त होकर सच्ची प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होगा।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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