संविधान की प्रस्तावना और उसके आदर्श कागजों पर बहुत सुंदर और त्रुटिहीन लगते हैं, लेकिन यथार्थ की खुरदरी जमीन पर उतरते ही ये अक्सर खोखले और निरर्थक साबित होते हैं। समानता, न्याय और सार्वभौमिकता के यह सिद्धांत जब सत्ता, स्वार्थ और जमीनी व्यवस्थाओं के तंत्र से टकराते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कक्षाओं में ‘पढ़ाया गया दर्शन’ और जीवन का ‘जीया गया यथार्थ’ दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं।
संकट के समय जब स्थापित व्यवस्थाएं और किताबी अधिकार काम नहीं आते, तब व्यक्ति को यह कठोर सत्य समझ आता है कि कोरे सिद्धांतों से समाज नहीं चलता; मनुष्य को अपनी आपदा से स्वयं ही उदय होना पड़ता है।
यही वह बिंदु है जहाँ एक व्यक्ति भ्रम से बाहर निकलकर विशुद्ध यथार्थवादी बनता है। एक सच्चा और व्यावहारिक नेतृत्वकर्ता, एक राजर्षि कभी भी इन खोखले आदर्शों की प्रतीक्षा या उन पर भरोसा नहीं करता।
वह जानता है कि बदलाव कोरे भाषणों या उधार के दर्शन से नहीं आता, बल्कि इसके लिए तकनीकी कौशल, आत्मनिर्भरता और एक ऐसे अर्थशास्त्र की आवश्यकता होती है जो सीधे जमीन और प्रकृति से जुड़ा हो।
यह मोहभंग होना दरअसल एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक मुक्ति है। जब यह समझ आ जाता है कि पढ़ाया गया ढांचा यथार्थ में काम नहीं करता, तभी व्यक्ति दूसरों की बनाई व्यवस्थाओं से उम्मीद छोड़कर, अपने दम पर ठोस और व्यावहारिक निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ता है और अपने जीवन में सफल होता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553

