मनुष्य का अस्तित्व केवल हाड़-मांस के शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चेतना के विभिन्न स्तरों पर जीता है। सामान्य मानवीय जीवन प्रायः दो ध्रुवों के बीच डोलता रहता है, ‘बुद्धि’ और ‘भावना’।
बुद्धि का क्षेत्र तर्क, गणना और सांसारिक लाभ-हानि तक सीमित है, यह हर वस्तु को उपयोगिता की कसौटी पर तौलती है और सूक्ष्म अहंकार को जन्म देती है। दूसरी ओर, मानवीय भावनाएं सुख-दुःख, राग-द्वेष और अपेक्षाओं के ज्वार-भाटे से संचालित होती हैं, जो व्यक्ति को अस्थिर बनाती हैं।
किंतु जब मनुष्य बुद्धि के तर्कजाल और भावनाओं के उद्वेग से ऊपर उठ जाता है, तब ‘उच्च आध्यात्मिक चेतना’ का उदय होता है। यह चेतना न तो मस्तिष्क की चंचलता है और न ही हृदय की भावुकता, बल्कि यह आत्मा का शुद्ध ‘साक्षी भाव’ और ब्रह्मांडीय प्रज्ञा से सीधा जुड़ाव है। जहाँ सामान्य बुद्धि भेद करती है, वहीं उच्च चेतना संपूर्ण सृष्टि में अद्वैत और एकत्व का दर्शन करती है।
ऐसे उच्च चेतना संपन्न व्यक्तियों की सबसे बड़ी पहचान उनका आभामंडल और स्वभाव होता है। उनके आभामंडल में एक अद्भुत चुंबकीय शीतलता और गुरुत्वाकर्षण होता है। उनके निकट बैठने मात्र से ही सामान्य व्यक्ति के मन का कोलाहल, भय और वैचारिक द्वंद्व स्वतः शांत होने लगते हैं।
स्वभाव की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति ‘कमल के पत्ते’ की भांति संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहते हैं। उनके भीतर न तो सांसारिक प्रशंसा की भूख होती है और न ही निंदा का भय।
उनका व्यवहार बाहर से अत्यंत सरल, सहज और करुणामय दिखता है, किंतु अपने जीवन-उद्देश्य और सिद्धांतों के प्रति वे हिमालय के समान अडिग होते हैं। वे अनावश्यक शब्दों का प्रयोग नहीं करते; उनकी वाणी से अधिक उनका ‘मौन’ और उनकी ‘उपस्थिति’ संवाद करती है।
क्रोध और प्रतिक्रिया से मुक्त होकर, वे हर विपरीत परिस्थिति को साक्षी भाव से देखते हुए सृजन में लगे रहते हैं। यही स्थिरता और निराकांक्षी स्वभाव उच्च चेतना का वास्तविक हस्ताक्षर हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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