बौद्ध धर्म, धर्म नहीं नास्तिकवादी दर्शन है ! : Yogesh Mishra

धर्म समाज को व्यवस्थित तरीके से चलने के लिये समाज द्वारा धारण किये गये वह नियम हैं !जिनका प्रभाव अनादि काल से अन्नत काल तक रहता है ! क्योंकि धर्म एक जीवनशैली है ! जीवन-व्यवहार का कोड है ! जो समझदारों, चिंतकों, मार्गदर्शकों, ऋषियों द्वारा सुझाया गया सात्विक जीवन-निर्वाह का मार्ग है ! जो सामाजिक जीवन को पवित्र एवं क्षोभरहित बनाये रखने की युक्ति है !

विचारवान लोगों द्वारा रचित नैतिक नियम प्रकृति के अनुकूल है ! इन्हीं नियमों के प्रभाव को जब समाज आत्म विकास के लिये जब स्वीकार लेता है ! तो यही धर्म कहलाता है ! इनमें लोक कल्याण की भावना निहित है न कि किसी पंथ या संप्रदाय मात्र के कल्याण की !

मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बतलाये हैं !

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः !
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥

(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरंग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना); यह दस मानव धर्म के लक्षण हैं !)

सनातन वैदिक जीवन शैली में ‘दर्शन’ उस ज्ञान को कहते हैं ! जिसके द्वारा तत्व का ज्ञान हो सके ! अर्थात मानव के दुखों की निवृति के लियह या तत्व ज्ञान कराने के लियह जिसने धर्म के सिद्दांतों को जिस रूप में जाना उसे दर्शन कहते हैं ! जोकि मात्र धर्म के देखने का एक तरीका है ! पर दर्शन स्वयं में कभी धर्म नहीं हो सकता है !

अर्थात सनातन धर्म के प्रति संशय की गाँठ तभी खुलती है ! जब व्यक्ति को अपने द्रष्टिकोण से धर्म के सत्य का दर्शन होता है ! मनु का कथन है कि सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर धर्मानुसार कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डालता है तथा जिनको सम्यक दृष्टि नहीं है वह ही विकृत धर्म के महामोह या जाल में फंस कर अपने को नष्ट कर देते हैं !

भारतीय ऋषिओं ने जगत के रहस्य को अनेक दृष्टिकोणों से समझने की कोशिश की गयी है ! जैसे हिन्दू दर्शन-परम्परा में न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, सांख्य दर्शन, योग दर्शन, मीमांसा दर्शन, वेदान्त दर्शन, वैशेषिक दर्शन,आदि ! यह सभी सात्विक दर्शन हैं !

अर्थात जिन्होंने वैदिक परम्परा के मर्यादा को बन्धन नहीं माना है बल्कि वेद को प्रमाण मानकर उसी के आधार पर अपने विचारों को आगे बढ़ाया है ! वह सभी आस्तिक दर्शन कहलायह हैं ! दर्शन ग्रन्थों को दर्शनशास्त्र भी कहा गया है ! यहाँ शास्त्र शब्द ‘शासु अनुशिष्टौ’ से निष्पन्न हैं !

ठीक इसी तरह भारत में कुछ ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया जो वैदिक परम्परा के बन्धन को नहीं मानते थे वह नास्तिक कहलायह हैं ! उनका भी जीवन को समझने का अपना एक वेद विहीन दृष्टिकोण है ! उन्हें सनातन धर्म में नास्तिक कहा गया है ! और उनके दर्शन को नास्तिक दर्शन कहा गया है ! इसकी भी चार धारायें मानी गयी हैं ! 1.आजीविक 2.जैन दर्शन 3.चार्वाक तथा 4.बौद्ध दर्शन !

कुछ विद्वानों ने आजीवक संप्रदाय के दर्शन को ‘नियतिवाद’ के रूप में चिन्हित किया है ! ऐसा माना जाता है कि आजीविक श्रमण नग्न रहते थे और परिव्राजकों की तरह घूमते थे ! ईश्वर, पुनर्जन्म और कर्म यानी कर्मकांड में उनका विश्वास नहीं था ! आजीवक संप्रदाय का तत्कालीन जनमानस और राज्यसत्ता पर कितना प्रभाव था कि इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि सम्राट अशोक और उसके पोते दशरथ ने बिहार के जहानाबाद (पुराना गया जिला) दशरथ ने स्थित बराबर की पहाड़ियों में सात गुफाओं का निर्माण कर उन्हें आजीवकों को समर्पित किया था !

जैन दर्शन अनुसार अस्तित्व या सत्ता के सात तत्वों में से दो तत्व प्रमुख हैं- जीव और अजीव ! जीव है चेतना या जिसमें चेतना है और अजीव है जड़ अर्थात जिसमें चेतना या गति का अभाव है ! जीव दो तरह के होते हैं एक वे जो मुक्त हो गये और दूसरे वे जो बंधन में हैं ! इस बंधन से मुक्ति का मार्ग ही कैवल्य का मार्ग है ! स्वयं की इंद्रियों को जीतने वाले को जिनेंद्र या जितेंद्रिय कहते हैं ! यही अरिहंतों का मार्ग है ! जितेंद्रिय बनकर जीओ और जीने दो ! यही “जिन” जैन दर्शन का सत्य है !

चर्वाक या लोकायत दर्शन स्पष्ट तौर पर ‘ईश्वर’ के अस्तित्व को नकारते हुए कहता है कि यह काल्पनिक ज्ञान है ! तत्व भी पांच नहीं चार ही हैं ! आकाश के होने का सिर्फ अनुमान है और अनुमान ज्ञान नहीं होता ! जो प्रत्यक्ष हो रहा है वही ज्ञान है अर्थात दिखाई देने वाले जगत से परे कोई और दूसरा जगत नहीं है ! आत्मा अजर-अमर नहीं है ! वेदों का ज्ञान प्रामाणिक नहीं है !

चर्वाक अनुसार यथार्थ और वर्तमान में जीयो ! ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नरक, नैतिकता, अनैतिकता और तमाम तरह की तार्किक और दार्शनिक बातें व्यक्ति को जीवन से दूर करती हैं ! इसीलिए खाओ, पियो और मौज करो ! उधार लेकर भी यह काम करना पड़े तो करो ! इस जीवन का भरपूर मजा लो यही चर्वाक सत्य है !

आइये अब यहाँ बौद्ध दर्शन की विस्तार से चर्चा करते हैं !

बुद्ध के उपदेश तीन अलग अलग खण्डों की विचारधारा में संकलित हैं ! यह सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाते हैं ! यह पिटक बौद्ध धर्म के आगम खण्ड हैं ! क्रियाशील सत्य की धारणा बौद्ध मत की मौलिक विशेषता है ! उपनिषदों का ब्रह्म अचल और अपरिवर्तनशील है ! बुद्ध के अनुसार परिवर्तन ही सत्य है !

इसी को पश्चिमी दर्शन में हैराक्लाइटस और बर्गसाँ ने भी परिवर्तन को सत्य माना है ! इस परिवर्तन का कोई अपरिवर्तनीय आधार भी नहीं है ! बाह्य और आंतरिक जगत् में कोई ध्रुव सत्य नहीं है ! बाह्य पदार्थ “स्वलक्षणों” के संघात हैं ! आत्मा भी मनोभावों और विज्ञानों की धारा है ! इस प्रकार बौद्धमत में उपनिषदों के आत्मवाद का खंडन करके “अनात्मवाद” की स्थापना की गई है !

फिर भी बौद्धमत में कर्म और पुनर्जन्म मान्य हैं ! आत्मा का न मानने पर भी बौद्धधर्म करुणा से ओतप्रोत हैं ! दु:ख से द्रवित होकर ही बुद्ध ने सन्यास लिया और दु:ख के निरोध का उपाय खोजा ! अविद्या, तृष्णा आदि में दु:ख का कारण खोजकर उन्होंने इनके उच्छेद को निर्वाण का मार्ग बताया !

अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ ! इस विरोध का फल यह हुआ कि बौद्ध धर्म को भारत से निर्वासित होना पड़ा ! किन्तु एशिया के पूर्वी देशों में उसका प्रचार हुआ ! बुद्ध के अनुयायियों में मतभेद के कारण कई संप्रदाय बन गये !

सिद्धांतभेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं ! इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं ! यह दक्षिणी बौद्धमत हैं ! इसका प्रचार भी लंका में है ! योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं ! यह उत्तरी बौद्धमत है ! इन चारों दर्शनों का उदय ईसा की आरंभिक शब्ताब्दियों में हुआ ! इसी समय वैदिक परंपरा में षड्दर्शनों का उदय हुआ ! इस प्रकार भारतीय पंरपरा में दर्शन संप्रदायों का आविर्भाव लगभग एक ही साथ हुआ है तथा उनका विकास परस्पर विरोध के द्वारा हुआ है ! पश्चिमी दर्शनों की भाँति यह दर्शन पूर्वापर क्रम में उदित नहीं हुए हैं !

वसुबंधु (400 ई.), कुमारलात (200 ई.) मैत्रेय (300 ई.) और नागार्जुन (200 ई.) इन दर्शनों के प्रमुख आचार्य थे ! वैभाषिक मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है ! अत: उसे बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा “सर्वास्तित्ववाद” कहते हैं ! सैत्रांतिक मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है ! अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं !

योगाचार मत के अनुसार बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं ! हमे जो कुछ दिखाई देता है वह विज्ञान मात्र है ! योगाचार मत विज्ञानवाद कहलाता है ! माध्यमिक मत के अनुसार विज्ञान भी सत्य नहीं है ! सब कुछ शून्य है ! शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है ! शून्यवाद का यह शून्य वेदांत के ब्रह्म के बहुत निकट आ जाता है !

इस प्रकार सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म नहीं बल्कि यह मात्र एक सनातन धर्म विरोधी नास्तिक दर्शन था ! जिसका प्रभाव लगभग 500 वर्षों तक पूरे आर्यावर्त पर रहा है ! जिसे समाज ने सनातन धर्म के विकल्प के रूप में माना था ! लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को देख कर बाद में इसे समाज ने अस्वीकार कर दिया !

किन्तु इस नकारात्मक दर्शन से विश्व में अनेक नये नास्तिक सम्प्रदायों की उत्पत्ति हुई है ! जो आज विश्व और मानवता के लिये समस्या बन गये हैं !

निरपेक्ष अर्थ में ‘धर्म’ की संकल्पना का किसी पंथ, संप्रदाय, विचारधारा, आस्था, मत-मतांतर, परंपरा, आराधना-पद्धति, आध्यात्मिक-दर्शन, किसी विशिष्ट संकल्पित मोक्ष-मार्ग या रहन-सहन की रीति-नीति से कोई लेना-देना नहीं है ! यह शब्द तो बाद में विभिन्न मतों/ संप्रदायों, आस्थाओं, स्‍थापनाओं को परिभाषित करने में रूढ़ होने लगा ! शायद इसलिए कि कोई दूसरा ऐसा सरल, संक्षिप्त और संदेशवाही शब्द उपलब्ध नहीं हुआ ! व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, जिम्मेदारी की पूर्ति और विशिष्ट परिस्थितियों में उचित कर्तव्य निर्वाह के स्वरूप को भी ‘धर्म’ कहां जाने लगा !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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